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Wednesday, 9 December 2015

''मंजिल की चाहत''

थोड़ा सा पा लिया।
थोड़ा और पा लूँ।

ख्वाहिशों में डूबी, गमों को तरासती
जिन्दगी को गले लगा लिया।

मन की आस को पूरा कर,
अब खुद को भी अपना बना लूँ।

मुश्किलों में लिखे गीत,
मंज़िल की राहों में आज गुनगुना लूँ।

सपनों में देखा जो कल,
अब इस आज को हकीकत बना लूँ।

इबादत की तेरी मालिक से इस कदर मैनें,,
कि तूझे (जिंदगी) अपनी इफ्तिखार बना लूँ।

थोड़ा सा पा लिया, थोड़ा और पा लूँ।
बादिया सी जिन्दगी में, उम्मीद के कुसुम उगा लूँ।

सुन्दर वादियों से,
आज किस्मत फिर से नई बना  लूँ।

मन की चाहत को,
कोशिशों से एक मिशाल बना लूँ।

थोड़ा सफर तय कर लिया ,
थोड़ा सा और तय कर लूँ।

बेनाम सी जिन्दगी को,
एक नाम दे कर रौशन कर लूँ।
-- धीरेन्द्र सिंह बिष्ट।

Tuesday, 8 December 2015

''मन"

झूठा मन हर बार इतराये,
मंज़िल से ये दूर ले जाए,
राह में राही को भटकाए,
विचलित कर झोकें सा
एक पल में मिलों तय कर,
लक्ष्य से कोसों दूर चला जाए।
झूठा मन हर बार इतराये,

सांचा मन हर आस जगाए,
हर कोशिश को उम्मीद बनाए,
एकाग्रता को स्थिर कर,
लक्ष्य को हासिल कर जाये।
सांचा मन गुमसुम सा,
मुश्किलों में कुसुम सा।

झूठा मन बढ़ा उत्पाती,
पल मे क्रोध, पल मे जज्बाती,
झूठ से दिलों को उलझाए,
आसान जिंदगी को मुश्किल बनाए. 
झूठा मन हर बार इतराये।

सांचा मन बढ़ा कोमल,
कभी शीतल तो कभी निर्मल।
सांचा मन धैर्य धाराएँ।
एकता के सूत्र में सबको सजाएँ।

झूठा मन एकतरफा ले जाये,
दुख में संयम खोकर
पारिस्थितियों को मुश्किल बनाए,
झूठा मन हर को बहकाये,
झूठे मत में सबको फसाए,

सांचा मन प्रकाश जैसा,
जीवन के हर लम्हों में विकास जैसा,
सांचा मन सबको अपनाए,
सुख में संयम रख कर,
जीवन को सफल बनाए,
-- धीरेन्द्र सिंह बिष्ट।

Friday, 4 December 2015

''आज की विरासत''

विरासतें बढ़ रही है।
जनता पिछड़ रही।
नेता मदमस्त हैं,
आम आदमी परस्त है।

अंकुश का सिलसिला 
अब फिर से चलेगा।
एक राजनीतिक दल,
दूसरे दल को लांछनों हमेशा छलेगा।

विकास के आस में आम आदमी
नेताओं से आस लगाये  हैं।
पर नेता समाचार चेनलों में,
तू-तू, नही, मैं-मैं का गुन गुनाये हैं।

देश के हालात बिगड़ रहे हैं।
राजनीति के जलवे बढ़ रहे हैं।
जो लोग मन्दिर में राम नहीं जपते,
फिर क्यूँ वो राजनैतिक गलियारे में
नाम राम राम जप रहे हैं।

पहले तो टीवी में गाँधी, कलाम 
के किस्से आते थे।
पर आज उसी देश की टीवी में
असहिसुणता और भाषा मे,
जाने कितने मतभेद नजर आते हैं।

क्या होता है जातिवाद?
और क्यों होता, आपसी विवाद।
खोल के देखो कुछ पन्ने अतीत के,
जो लाल हैं अपनों के खून से.
मतभेद की भावनाओं से
हर किताब का पन्ना बेहाल है.

हर पन्ना यही दोहराता है,
इंसान का आज इंसानियत से,
ना ही  कोई रिश्ता ना कोई नाता है.
कुछ नाता गर रहा भी,
वहाँ सिर्फ़ मतलबों का सार भरा है.

क्या मस्जिद, क्या मन्दिर है?
इंसान ने भगवान को बाँट दिया।
धर्मो जंजाल में खुद को पाट दिया।

कुदरत ने ये सृष्टि बनाई,
कई रंगों से इसे सजाई।
इन रंगों को जीवन में लाओ
रंगों की चमक से
आपस मे प्यार बढ़ाओ।

क्या रखा उन बीती बातों में,
वो समय बहुत रुलाता है
सिर्फ़ आपसी मतभेद की
आप बीती सुनाता है।

इन जात- पात की बातों से
हर माँ का दिल आज भी,
दुःखों से भर जाता है।

चन्द शब्दों से बस यही
कहना चाहता हूँ,
सोच को सोच नही 
माहॉल से जितना चाहता हूँ,

मेरी कलम सच लिखना चाहती है।
प्यार की स्याही से लोगों को
एकता में बांधना चाहती है।
प्रयास यही रहेगा,
भारत के सपनों को सच करने में,
हम सब का सहयोग सदा रहेगा।
-- धीरेन्द्र सिंह बिष्ट।