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Tuesday, 8 December 2015

''मन"

झूठा मन हर बार इतराये,
मंज़िल से ये दूर ले जाए,
राह में राही को भटकाए,
विचलित कर झोकें सा
एक पल में मिलों तय कर,
लक्ष्य से कोसों दूर चला जाए।
झूठा मन हर बार इतराये,

सांचा मन हर आस जगाए,
हर कोशिश को उम्मीद बनाए,
एकाग्रता को स्थिर कर,
लक्ष्य को हासिल कर जाये।
सांचा मन गुमसुम सा,
मुश्किलों में कुसुम सा।

झूठा मन बढ़ा उत्पाती,
पल मे क्रोध, पल मे जज्बाती,
झूठ से दिलों को उलझाए,
आसान जिंदगी को मुश्किल बनाए. 
झूठा मन हर बार इतराये।

सांचा मन बढ़ा कोमल,
कभी शीतल तो कभी निर्मल।
सांचा मन धैर्य धाराएँ।
एकता के सूत्र में सबको सजाएँ।

झूठा मन एकतरफा ले जाये,
दुख में संयम खोकर
पारिस्थितियों को मुश्किल बनाए,
झूठा मन हर को बहकाये,
झूठे मत में सबको फसाए,

सांचा मन प्रकाश जैसा,
जीवन के हर लम्हों में विकास जैसा,
सांचा मन सबको अपनाए,
सुख में संयम रख कर,
जीवन को सफल बनाए,
-- धीरेन्द्र सिंह बिष्ट।

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