तूफान तो ना था वो...
शायद हवा का झोंका था।
जिसे जिन्दगी की डोर (प्यार)
समझ बैठा था।
शायद वो मेरे मन का धोखा था।
मंजिल का जरिया,
जिसे समझ बैठा था।
वो जिन्दगी का सबसे
उदासीन तोहफा था।
दिल तो ना टूटा,
पर मेरे अरमान जरूर टूटे।
बेपरवाह जज़्बात के आसूँ,
नम आँखों से फूटे।
मन में कभी हलचल करने वाला शहर,
अब वीरान सा लगने लगा।
धड़कनें शोरगुल शहर में खोकर,
एक नई दुनिया खोजने लगी।
जाने वो पल क्यों ऐसा,
कुछ अनसुलझी पहेली जैसा।
जिसे मैं उस रोज सुलझाता,
वो सुलझती और मैं उलझ जाता।
-- ''धीरेन्द्र'' (धीर)
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