जिन्दगी कोे ऐसे जाना,
जैसे कोई सफर था सुहाना।
कुछ रास्तों नेे इस कदर पहचाना,
लिखेगा ''धीर'' कोई अफ़साना।
उस कल में मैं यूँ खोया,
गोया सुर कोई, मेरे मन ने संजोया।
वो पागलपन था या जूनून,
ये तय कर पाना मुश्किल था।
बस यही चाहत थी मन।
कुछ कर दिखाऊँ।
हर हद से गुजर।
''ऐ जिन्दगी! बस तुझमें निखार लाऊँ।''
कोई हँसता, हालात पर मेरी,
और कोई देख तरसता, लगन को मेरी।
सपनो ने, दिन को रात
और रातों को दिन बनाया।
पाने की धुन में, हाय!
उस पल ने आँसूओं से मुँह धुलाया।
-- ''धीरेन्द्र'' (धीर)
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