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Thursday, 23 March 2017

नया कल

वक्त से कदम मिलाकर,
जिंदगी से सीख रहा हूँ|
ख्वाहिशों के शहर मे आज,
नये कल को खोज रहा हूँ|

बिखर रहा हर रोज अब,
नये कल को निखारने में|
जाने क्यूँ बीत रहा ये पल एसे,
मानो सदियों लग रही हों इसे बिताने में|
-- धीरेन्द्र (धीर)..,

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