एक ख्वाहिश उस रोज,
ख्वाबों के शहर मे|
ओस की बूँद की भांति
जा गिरी मन से ख्यालों के समंदर मे|
देख अचम्भा धीर,
कुछ पल के लिए|
मानो थम गया था वो दिन,
बस कुछ पल के लिए|
उस कल्पनाओं में था कुछ ऐसा,
मानो आशाओं के सावन में, उमंगों के बाहर जैसा|
-- धीरेन्द्र (धीर)..,
No comments:
Post a Comment