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Monday, 27 March 2017

"ख्वाबों के शहर मे"

एक ख्वाहिश उस रोज,
ख्वाबों के शहर मे|

ओस की बूँद की भांति
जा गिरी मन से ख्यालों के समंदर मे|

देख अचम्भा धीर,
कुछ पल के लिए|

मानो थम गया था वो दिन,
बस कुछ पल के लिए|

उस कल्पनाओं में था कुछ ऐसा,
मानो आशाओं के सावन में, उमंगों के बाहर जैसा|
-- धीरेन्द्र (धीर)..,


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