ऐसा क्या आज दिल में ,
जो खुद से बयां करने को जी नही करता!
क्यूँ भर लिए "तरकश" से शब्द मन ने,
जो आज खुद में खोने को जी नही करता!
ख्वाहिशों की पनाह में होकर,
फिर क्यूँ आज खुद से दूर रहने को जी सा करता!
तय कर ली भीड़ में मीलों तन्हाई,
फिर क्यूँ आज तन्हाई से डर सा लगता!
जीत लिया हर आस को मन से,
फिर क्यूँ आज हारने को दिल सा करता!
ऐसा क्या आज दिल में ,
जो खुद से बयां करने को जी नही करता!
-- धीर (धीरेन्द्र)...,
जो खुद से बयां करने को जी नही करता!
क्यूँ भर लिए "तरकश" से शब्द मन ने,
जो आज खुद में खोने को जी नही करता!
ख्वाहिशों की पनाह में होकर,
फिर क्यूँ आज खुद से दूर रहने को जी सा करता!
तय कर ली भीड़ में मीलों तन्हाई,
फिर क्यूँ आज तन्हाई से डर सा लगता!
जीत लिया हर आस को मन से,
फिर क्यूँ आज हारने को दिल सा करता!
ऐसा क्या आज दिल में ,
जो खुद से बयां करने को जी नही करता!
-- धीर (धीरेन्द्र)...,

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