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Saturday, 15 July 2017

जरिया ऐ जिंदगी

खुद को खुद से इस कदर तराशा.!
जिंदगी में कभी जीत की आशा तो कभी हार से निराशा.!

कभी खुद को लिख कर, कभी पढ़कर लिखा,
ख़्वाहिश को भूल कर हर पल मुश्किलों से लड़ा .!

रूठा था कल चन्द लम्हों से ,
पर आज ज़िंदगी चाहत बन गई.!

नफरत का दौर तो आज भी है,
पर जिंदगी में मोहब्बत एक दुआ सी बन गई.!

लिखना इबादत था,
और आज जरिया ऐ जिंदगी बन गई.!
-- धीर (धीरेन्द्र)..,





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