कभी शौक था लिखना लम्हों को,
आज यही ज़िन्दगी बन गया है.!
खो कर उसी को मिला है,
जिसने ज़िन्दगी को ज़िन्दगी से जिया है.!
गमों से उभर के तो देखो,
ज़िन्दगी तब तब हँसी है.!
जब जब उसके चेहरे पर
किसी ने दिल के बात पढ़ी है.!
-- धीर (धीरेन्द्र)...,
आज यही ज़िन्दगी बन गया है.!
खो कर उसी को मिला है,
जिसने ज़िन्दगी को ज़िन्दगी से जिया है.!
मन की किताब हर जगह खुलती नहीं ,
बस इसे तलाश रहती है पढ़ने वालों की.!
बस इसे तलाश रहती है पढ़ने वालों की.!
गमों से उभर के तो देखो,
ज़िन्दगी तब तब हँसी है.!
जब जब उसके चेहरे पर
किसी ने दिल के बात पढ़ी है.!
-- धीर (धीरेन्द्र)...,

क्या मेरी रचना शामिल हो सकती है इस संकलन मैं
ReplyDeleteहाँ क्यूँ नही , आप साझा कर सकते हैं है, आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभार आदरणीय जी.
Delete