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Sunday, 9 July 2017

ज़िन्दगी

कभी शौक था लिखना लम्हों को,
आज यही ज़िन्दगी बन गया है.!

खो कर उसी को मिला है,
जिसने ज़िन्दगी को ज़िन्दगी से जिया है.!

मन की किताब हर जगह खुलती नहीं ,
बस इसे तलाश रहती है पढ़ने वालों की.!

गमों से उभर के तो देखो,
ज़िन्दगी तब तब हँसी है.!

जब जब उसके चेहरे पर
किसी ने दिल के बात पढ़ी है.!
-- धीर (धीरेन्द्र)...,





2 comments:

  1. क्या मेरी रचना शामिल हो सकती है इस संकलन मैं

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    1. हाँ क्यूँ नही , आप साझा कर सकते हैं है, आपकी प्रतिक्रिया के लिए आभार आदरणीय जी.

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