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Friday, 13 November 2015

मौली

(इस कहानी में मौली एक गाय का नाम है। कहानी में मुख्य भूमिका मौली की है उसके बाद एक नन्हे चार वर्षीय बालक की है। बालक बहुत नटखट और शरारती है
पर समय के अनुसार उसे मौली से बहुत लगाव हो जाता है। वैसे मौली एक जानवर है पर वह इंसानों से कई गुना समझदार है।
मौली स्वेत रंग की और दिखने में बहुत सुन्दर प्यारी है।
उसके सिंग पीछे को घुमाऊ आकृति के हैं। इसलिये सब उसे प्यार से मौली कहकर पुकारते है।)
 
      एक दिन मै खेलते खेलते अचानक गौशाला में चला गया। मौली अपना चारा खा रही थी और पूछ से मख्खी को अपने शरीर में बैठने से भगा रही थी। मै उसकी पूछ को देखने लगा और इतने में मैने उसकी पूछ पकड़ ली और झुलने लगा। तभी अचानक मौली का पैर मेरे पैर के ऊपर आ गया, मै जोर से चिल्लाया और रोने लगा। इतने में मौली ने अपने पैर को उठाया और मेरे पैर को अपनी जीभ से चाटने लगी। इतने में माँ आ गई और माँ ने पैर पर मरहम लगाया और गौशाला में जाने से मना किया। कुछ दिन बाद पैर की चोट सही हो गई।
     एक दिन मै फिर से गौशाला की तरफ गया, किन्तु इस बार मै थोड़ा डरा हुआ था फिर भी मै कोशिश करते हुये मौली के पीछे जाने के बजाय आगे की तरफ बढ़ा।
और मौली के सामने खड़ा हो गया।
मैने डरते हुये अपनी अँगुली मौली के नाक पर रखी। मौली मेरी हथेली को अपनी जीभ से चाटने लगी। नटखट तो में था ही, इतने में मुझे एक शरारत सूझी और मै मौली के नाक पर बैठा और उसके सीगों को हाथ से पकड़कर बोला “मौली झूला झूला”। इतने में मौली ने अपना सिर ऊपर किया और गर्दन हिलाई मुझे नीचे गिरा दिया।
तभी आहट सुनकर माँ आ गई पर इस बार मुझे कोई चोट नहीं आयी। माँ कान पकड़कर ले गई।
अगले दिन जैसे ही सवेरा हुआ में पुनः गौशाला गया और वही हरकत फिर दोहराई और बोला “मौली झूला झूला”। किन्तु आज मौली ने मुझे नीचे गिराने के बजाय झूला झुलाया। मै बहुत खुश हुआ। मेरी ये शरारतें रोज होने लगी। मेरा रोज का नियम बन गया, मौली की नाक में बैठकर झूला झूलने का। मौली जानवर होने के बाद भी एक बच्चे (मुझे) को माँ की तरह बहुत प्यार करती थी। मेरा और मौली का साथ इतना ही था।
   एक दिन अचानक पापा ने मौली को दूर के सम्बंधियों को शौप दिया। यह सुनकर मुझे बहुत दुःख हुआ। मै मौली के पास रोज की तरह गया और मौली ने मुझे झुलाने के लिए अपना सर नीचे की ओर झुकाया पर उस दिन मै झूलने की बजाय, उसे बिस्किट दिये और उसके कान मै बोला “मौली तू उनके साथ मत जाना”। पर तब में नादान था और वो बेजुबां मौली बेबस थी। जैसी ही वो लोग मौली को ले जा रहे थे तब मौली बार बार अपने कदम पीछे को ओर खींच रही थी। किन्तु वो लोग फिर भी मौली को ले गये। मै देखता रहा और पुरे दिन रोता रहा पर किसी ने मेरी नहीं सुनी।
   उस दिन के बाद से मैने मौली को कभी नहीं देखा। आज भी मै उन पलों के बारे मै जब भी सोचता हूँ,
पहले अपनी नटखटपन से मुस्कुराता, फिर आँखों की लहरों को ना रोक पाता।
“मेरी प्यारी मौली”
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

सपनों में नहीं रहना मुझे

सपनों में नहीं रहना मुझे,
हकीकतों में जीना है मुझे।
मेरी कोशिश ही,
मेरी जीत तय करेगी।
मेरी सोच मेरी कामयाबी की मिसाल बनेगी।
मेरी कामयाबी,
सभी को प्रेरित करेगी।

सपनों में नहीं रहना मुझे।
मुश्किलों से लड़ना है मुझे।
काँटों से फूलों को चुनना है मुझे।
जिन्दगी की दौड़ में,
हर मुसीबत से भिड़ना है मुझे।
परिणाम की परवाह छोड़ कर,
मंजिल की ओर बढ़ना है मुझे।

सपनो में नहीं रहना मुझे।
मैं अक्सर बन्द आँखों के
सपनों से डर कर बिखर जाता हूँ ,
सुहानी नींद से जागकर
अधूरी मंजिल को पाता हूँ।

बन्द आँखो के सपनों का क्या है,
मन को निराश बना जाते हैं।
जिन्दगी की दौड़ में,
मेरी उम्मीद को भटकाते हैं।
बिखर कर बनना
अच्छा लगता है।
किन्तु बनकर बिखरना,
बुरा लगता है।

इन सपनों में पड़कर
अक्सर बहुत कुछ खोया है मैने।
आँखों को आसूँ से
हर दिन भिगोया है मैने।

ख्यालों में खोकर,
सपने देखना छोड़ दिया मैने।
अपनी आने वाली मंजिल को,
नया मोड़ दिया है मैने।

रुक रुक कर,
सफर तय करना है मुझे।
हकीकतों में रहकर
मंजिल को पाना है मुझे।
सपनों में नहीं रहना है मुझे।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

फाउन्टेन पैन

कहानी का सारांश
      (इस कहानी में मुख्य भूमिका एक पाँचवी कक्षा में पढ़ने वाले बालक की है। जो फाउन्टेन पैन पाने के लिए बहुत उत्सुक रहता है, दूसरी भूमिक उसके उसके पिता की है, पुत्र के मन की लालशा पूरी करने के लिये पिता ने पुत्र के मन में एक उमंग जगाई।)

       एक दिन मै अपनी कक्षा में सहपाठियों को फाउन्टेन पैन से लिखता देख, मेरे मन में भी फाउन्टेन पैन पाने की लालशा जगी। तभी मै अपने सहपाठियों के पास गया और बोला ” आपकी फाउन्टेन पैन बहुत सुन्दर है, क्या आप लोग मुझे इस फाउन्टेन पैन से लिखने दोगे? उन्होंने इंकार कर दिया। सहपाठियों की बात सुनकर मै मन ही मन बहुत दुःखी हुआ और रास्ते भर फाउन्टेन पैन के बारे में सोचता रहा। आँखो में बार बार फाउन्टेन पैन ही चमक रही थी। घर आया और माँ से फाउन्टेन पैन के बारे में जिक्र किया। फाउन्टेन पैन उस जमाने के अनुसार बहुत महँगा था किन्तु माँ ने मेरा मन रखने के लिए हाँ बोल दिया। शाम हुई पिता जी खेतों से घर आये। संध्या पूजा के बाद माँ ने पिता जी को मेरी नयी माँग, फाउन्टेन पैन के बारे में बताया। पिता ने माँ की बात सुनी और विनम्र भाव से बोले “फाउन्टेन पेन बहुत क़ीमती है”।
माँ ने जवाब दिया “पर बेटे से बढ़के थोड़ी है।” माँ की बात सुनकर पिता जी बोले आपकी बात सही है, पर अभी उसकी कोई भी माँग पूरा करने का उचित समय नहीं है।
“यदि मै उसे अभी फाउन्टेन पैन ला के दूँ तो उसे उसकी अहमियत पता नहीं लगेगी। उसकी माँग बढ़ती जायेगी और वह पढ़ाई में मन नहीं लगा पायेगा। जब तक वह कोई अच्छी उपलब्धि हासिल नहीं कर लेता। अभी उसकी फाउन्टेन पैन पाने की कोई माँग पूरी नहीं होगी।
     पिता जी का कहना भी समय के अनुसार उचित था पर तब मै इस बात को समझने में असमर्थ था।
   अगले दिन प्रातःकाल पिता जी ने फाउन्टेन पैन की माँग पूरी करने से साफ मना कर दिया। यह सुनकर मुझे बहुत बुरा लगा। मै उदास मन से स्कूल गया। घर लौटते समय मन ही मन पैन पाने की लालशा के बारे में सोचता रहा। जैसे ही मै घर पहुँचा। माँ ने हाथ पैर धुलवाये और खाना खाने को बैठाया, किन्तु मैने खाना खाने से इंकार कर दिया।
शाम को माँ ने पिता जी को बताया कि आज सुबह से मैने कुछ नहीं खाया।
   माता पिता जी का लाड़ला तो था ही पर पिता जी ज्यादा लाड़ नहीं दिखाते थे। वो मन ही मन घबराते थे कही मै बिगड़ ना जाऊँ।
    अगले दिन माँ ने मुझे स्कूल के लिए तैयार किया, तभी पिता जी आये और मेरा हालचाल पूछने लगे किन्तु मै खामोश रहा। वो समझ गये कि मैने मन में फाउन्टेन पैन पाने की हठ बना ली है।
  यह सब देख कर पिता जी शान्त रहे और अचानक बोल पड़े “फाउन्टेन पैन की माँग तो आपकी पूरी होगी, पर मेरी भी एक शर्त है। पिता जी की बात सुनकर मै मन ही मन ख़ुशी से झूम उठा।
    मेरे मन में फाउन्टेन पैन पाने की लालशा थी तो मै हर शर्त पूरा करने के लिये उत्सुक था। पिता जी बोले ” यदि इस बार तुम कक्षा अच्छे अंको से परीक्षा उत्तीर्ण करोगे तो मै आपकी फाउन्टेन पैन की माँग पूरी करूँगा। पिता जी की बात सुनकर पहले तो चुप रहा फिर अचानक बोला पड़ा, “मुझे मंजूर है।”
    फिर क्या था, पिता जी ने मेरे अन्दर फाउन्टेन पैन पाने के लिए एक नयी उमंग जगा दी। फाउन्टेन पैन की लालशा के कारण मैने खेलना भी कम कर दिया। स्कूल से आता बस पढ़ाई में करने बैठता। मेरे अन्दर इस बदलाव को देख कर पिता जी मन ही मन मुस्कुराते थे।
    धीरे धीरे परीक्षा समीप आ गई। मै परीक्षा के लिए परिपूर्ण था। फिर भी एक डर मन को अन्दर ही अन्दर शता रहा था। परीक्षा पूर्ण हुई। सभी सहपाठियों के अभिभावको को विद्यालय में बुलाया गया। मै और पिता जी स्कूल पहुँचे। सबके सम्मुख प्रधानाध्यापक ने मुझे सराहा मै कक्षा में अच्छे अंको से उत्तीर्ण हुआ था। पिता जी बहुत खुश हुये। घर लौटते समय सर्वप्रथम पिता जी ने मुझे फाउन्टेन पैन दिलाया। फाउन्टेन पैन पाकर मै ख़ुशी से फुला ना समा सका। पहली बार इतना खुश था कि मानो मैने अपने जीवन की अमूल्य वस्तु प्राप्त कर ली। पर वह फाउन्टेन पैन पाना मेरे लिये बहुत बड़ी उपलब्धि थी।
    “उपलब्धियां चाहे कितनी छोटी या फिर बड़ी ही क्यों ना हो,
इंसान का हौसला जरूर बुलन्द करती हैं।”
फाउन्टेन पैन पाने की यही उत्सुकता आगे जाकर मेरी सफलता बनी।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

कर्मो का फल

कहानी का सारांश:-
इस कहानी में मुख्य भूमिका पिता के रूप में दीनानाथ की है। अपने आदर्शो के लिये दीनानाथ प्रसिद्ध हैं। दीनानाथ के बाद एक और अहम भूमिका उनके छोटे पुत्र हरिनाथ की है। हरिनाथ अपने पिता के आदर्शो और उनके द्वारा दिये संस्कारों में अपना जीवन व्यतित करते है। और अंत में अपने कर्मोे के अनुरूप अपने जीवन का सुख भोगते है।
    सबक के तौर पर कहानी में एक और भूमिका दीनानाथ के बडे पूत्र बंशीनाथ की है। बंशीनाथ पिता के आदर्शों को ठुकरा कर धन दौलत के मोह में वशीभूत हो कर अपने कर्माे का फल भोगते हैं।
हरिपुर नामक एक गाॅव है। गाँव में दीनानाथ नाम का एक वरिष्ट किसान है। दीनानाथ बहुत दयालू और इमानदार प्रवृति के व्यक्ति है। दीनानाथ के दो पूत्र है पूत्रों को जन्म देने के बाद उनकी पत्नि निर्जला चल बसी। पूत्रों का लालन पालन दीनानाथ ने स्वयं किया।
दीनानाथ अपनी बुद्धिमत्ता व उदारता के लिये अपने गाँव के साथ अन्य गाँवों में जाने जाते थे। इसीलिये गाँव वालों ने उन्हें गाँव का मुख्या नियुक्त किया। कुछ समय बाद बंशीनाथ व हरिनाथ की शिक्षा समाप्त हुई। बंशीनाथ अपने पिता के साथ उनके व्यवसाय में लेखा पढ़ी के कार्य में रूचि लेेने लगा, किन्तु दीनानाथ के छोटे बेटे का मन उनके व्यवसाय में नही लगा। वो कई बार उनके दफ्तर से भाग जाता और घूमने निकल जाता। घूमते-घूमते वो लोगों से मिलते और उनकी समस्याओं को सुनते और उनका हल निकालने की कोशिश करते। जैसे-जैसे समय बीतता गया बंशीनाथ ने अपने पिता का सारा कारोबार अपने हाथों मे सम्भांल लिया। उनका कारोबार अच्छा चलने लगा। किन्तु दीनानाथ के मन में फिर भी एक चिन्ता थी। जो उनके चहरे पर साफ-साफ झलकती थी।
प्रातः काल का समय है, चिड़ियाँ चँह चँहा रही है और हवाओं में थोड़ा नमी है। सूरज अपनी लालीमा से नन्हे-नन्हे पौधों में पड़ी ओंस की बुंदों को अपनी लाली से ऐसे सुशोभित कर रहा है मानों पौधों में प्रकर्ति ने मोतियां बिखेर दी हैं। रोज की तरह दीनानाथ अपने बाग में शाल लपेटे हुए टहल रहे हैं। तभी इतने में उनके एक मुनिम (मुलचंद) उनके पास आयें। मालिक को चिन्ता में देख कर बोले ‘‘क्या बात है, मालिक आज आप बड़े परेशान लग रहे हो? ‘‘मुलचंद की बात सुनकर दीनानाथ पहले कुछ देर के लिये खामोश रहे और आखों से चश्मा उतारा फिर बोले। ‘‘सब ठीक है मुलचंद।‘‘
मुलचन्द- ‘‘ सब ठीक है पर आपके चहरे की खामेाशी कुछ दर्शा रही है कुछ ऐसा है जो ठीक नही है मालिक। ‘‘मुलचन्द की बाते सुनकर दीनानाथ मुस्कुराये और बोले ‘‘आप ने सत्य कहा मुलचंद।‘‘
दीनानाथ – ‘‘मैं हरिनाथ की हरकतों से चिन्तित हूँ, इस लडके को अपने भविष्य के प्रति कोई सुध-बुध नही है न जाने अपना जीवन कैसे व्यतीत करेगा।
मुलचन्द –‘‘ मालिक, छोटे मालिक के बारे में आपका सोचना व्यर्थ नही है। आपकी इस चिन्ता का मेरे पास एक हल है।‘‘
दीनानाथ- ‘‘ बोलो मुलचंद क्या हल है?‘‘
मुलचंद – ‘‘ मालिक आपके दोनो पुत्र अब बड़े हो गये हैं और अपनी सारी जिम्मेदारियों से परिचित हैं। आप दोनों पुत्रों का विवाह करवा दीजिये।‘‘इतना कह कर मुलचन्द ने इज़ाजत ली।
मुलचन्द की बातें दीनानाथ रात भर सोचते रहे, अगले दिन प्रातः उन्होने दोनों पुत्रों का विवाह करने का निर्णय लिया। कुछ समय पश्चात दीनानाथ ने एक अच्छा सा मर्हुत देख कर दोनों पुत्रों का विवाह बड़ी धुम-धाम से किया। सब अच्छा चल रहा था, लोगों के प्रति मन में उदार भावना व परिवार के प्रति जिम्मेदारियां निभानें में दीनानाथ ऐसे व्यस्त रहतें कि छोटी मोटी बिमारियों को नज़र अंदाज करते रहे। धीरे-धीरे दीनानाथ को बिमारियों ने ऐसे जकड़ लिया कि अचानक उनका देहांत हो गया। उनका सारा कारोबार अब बंशीनाथ देखने लगें। बडें भाई के प्रति हरिनाथ के मन में एक सम्मान भावना थी। जैसा बंशीनाथ कहते हरिनाथ उनकी आज्ञा का पालन करते।
एक दिन छल कपट कर बंशीनाथ ने झूठी वशीयत बना कर  अपने छोटे भाई को घर से निकाल दिया। यह सब देखकर बंशीनाथ की पत्नी को बहुत दुख हुआ वह बंशीनाथ से बोली ‘‘आप कैसे भाई हो! दौलत के लालच में आकर आपने अपने ही भाई को घर से निकाल दिया। कुछ सीखो अपने छोटे भाई से, आपकी खुशी के लिये उन्होनें घर त्याग दिया। बंशीधर की आंखों में दौलत का ऐसा चश्मा लगा की वह अपने रिश्ते नाते सब भुल गया। इधर हरिनाथ अपनी पत्नी के साथ अपना सब कुछ त्याग कर, दूर शहर में एक मंदिर में पहुँचे। मंदिर में पुजारी ने दोनों को देखा और मन में उन दोनों कें विषय में विचार किया ‘‘वेश भुषा में तो ये किसी बड़े घरानें के लोंग जान पड़ते हैं। फिर कोशिश कर के दोनों (पति-पत्नी) से पूछा ‘‘आप लोग कौन हैं?”
क्या मैं इतनी रात को मन्दिर आने का कारण जान सकता हूँ?
हरिनाथ ने अपनी व्यथा पुजारी को सुनाई। हरिनाथ की बाते सुनकर पुजारी का मन भर आया और उसने हरिनाथ और उसकी पत्नी को मंदिर के धर्मशाला में शरण दी और कहा बदले में आप दोनों को मंदिर परिसर की सेवा करनी होगीं। हरिनाथ मुस्कुरायें और सहमत हो गयें। हरिनाथ मंदिर में रहने लगें और मंदिर परिसर के अनुसार कार्य करने लगें उनकी पत्नी भी फुलों की माला व मंदिर के दीये बना कर दोनों अपना जीवन-यापन करने लगे।
प्रातः काल का समय है मंदिर में पुजा अर्चना चल रही है, भक्तों का आवागमन जारी है पूजा समापन होने के बाद हरिनाथ ने सभी भक्तों में प्रसाद वितरण किया। भक्तगण अपने घरों को वापस जाने लगें तभी हरिनाथ को मंदिर में एक बडा संदूक दिखाई दिया, हरिनाथ ने संदूक उठाया और देखा संदूक में एक बड़ा ताला लगा था। हरिनाथ ने उसे मंदिर परिसर को सौप दिया अगले दिन रोज की तरह पूजा अर्चना हुई, सभी भक्तगण आयें और प्रसाद ग्रहण कर चले गये। किन्तु उस दिन संदूक लेेने कोई नही आया तभी हरिनाथ ने मंदिर परिसर के सभी लोगों को अज्ञात संदूक के बारें में अवगत कराया। यह सब सुनकर पुजारी को हरिनाथ पर हर्ष हुआ और पुजारी ने सभी के सामने हरिनाथ को मंदिर परिसर का प्रबन्धक नियुक्त किया।
सांय काल का समय है मंदिर मे संधा पूजन का समय शुरू हुआ, पूजा सम्पन्न हुई प्रसाद वितरण कर हरिनाथ अपने कक्ष में आतें हैं।
कक्ष में बैठ कर हरिनाथ सोच में डुबे हुये हैं। तभी उनकी पत्नी मंगला उनके पास आती है, और उनसे पुछती है ‘‘अब तो प्रभु की कृपा से सब कुछ ठीक हो गया है, आप किस विषय को लेकर चिन्तित हैं?
मंगला की बात सुनकर हरिनाथ बोले ‘‘प्रभु की कृपा से पहले भी जीवन व्यतीत कर रहे थे, अभी भी कर रहे हैं, किन्तु चिन्ता का विषय यह संदूक है। जिस किसी का भी यह होगा, ना जाने वह कैसी दशा में होगा।‘‘
अगले दिन प्रातः हरिनाथ ने मंदिर परिसर में बैठक बुलाई और संदूक के विषय में चर्चा की। ‘‘जिस किसी का यह संदूक है, हमें उस व्यक्ति तक हर परिस्थिति में संदूक को उसके पास पहुँचाना है।‘‘ सभा में बैठे सभी के सम्मुख हरिनाथ ने अपनी बात रखी। संदूक के विषय में मंदिर की दीवारों में पोस्टर लगायें गयें, जगह-जगह संदेश भेजा गया।
दोपहर का समय है तभी संदूक वाला साहुकार मंदिर में आया और माँ के चरणों में रोने लगा। साहुकार को देखकर हरिनाथ उसके पास गयें और उसको पानी पिलाया और विनम्र भाव से पुछा ‘‘आप कौन हैं ? आप क्यों दुखी हैं?‘‘
साहुकार ने दुःखी मन से अपनी व्यथा सुनाई, ‘‘श्रीमान मैें एक साहुकार हूँ। लोगों का धन व आभुषण मेंरे पास जमा रहता हैं। उसी जमा किये हुये कुछ आभुषण और धन का एक संदूक न जाने मेैं कहाँ भुल गया।‘‘ धीरज बधाते हुए हरिनाथ ने साहुकार से संदूक की पहचान पूछी।
साहुकार -‘‘मेरे पास संदूक की चाबी है और संदूक में एक मेरे पत्नी का हीरों का हार भी है। जिसमें 12 मोती और 3 हीरे जड़ें हैं। ‘‘साहुकार की बात सुनकर हरिनाथ ने संदूक मंगवाया और मंदिर परिसर के सभी लोगों के सम्मुख संदूक को खुलवाया। वह संदूक साहूकार का ही था उसमें 12 मोती और 3 हीरों से जड़ा हार भी था। हरिनाथ ने संदूक साहुकार का सौंपा।
संदूक पाकर साहुकार की खुशी का ठिकाना नही रहा। साहुकार ने संदूक से कुछ आभुषण व गहने इनाम के रूप में हरिनाथ को भेंट करना चाहा किन्तु हरिनाथ ने उन्हें स्वीकार करने से इनकार कर दिया। तभी हरिनाथ ने उन आभूषणों में से एक सोने का सिक्का उठाया और मंदिर में माता रानी के चरणों में रख कर बोले ‘‘यदि मुझे इनाम की आवश्यकता होती तो, मैं पूरा संदूक ही अपने पास रख लेता। ये जिसकी अमानत है कृप्या आप उन्हें लौटा दीजिये। इसी में मेरी व मंदिर परिसर की खुशी है। यह सब सुनकर मंदिर मे मौजूद सभी लोग हरिनाथ की जय जय कार करने लगें।
साहुकार ख़ुशी-ख़ुशी से अपने नगर लौट गया।
फिर क्या था, हरिनाथ और मंगला अपना जीवन ख़ुशी-ख़ुशी यापन करने लगे। हरिनाथ ने अपने शब्दों व् अपने व्यवहार से लोगों का मन मोह लिया। कुछ समय बाद उन्हें शहर वाशियों ने नगर प्रमुख  नियुक्त कर दिया।
उधर धन के मोह में वशीभूत बंशीनाथ का कारोबार धीरे-धीरे डूबने लगा। व्यापार के लिये महाजनों से लिया ऋण समय पर वापस न करने पर बंशीनाथ कर्ज में डूब गया। धीरे-धीरे वह धन हीन हो गया।
अब क्या था, बंशीनाथ के परिवार की स्थिति भूखों मरने वाली हो गई। बच्चे भूख से बिलबिलाने व तड़पने लगे। अपने परिवार के ऐसी स्थिति बंशीनाथ से देखी नहीं गई। और बंशीनाथ ने अपना गाँव छोड़ दिया। वह अपने परिवार के साथ शहर की तरफ आ गया।
किस्मत का लेखा कोई नहीं बदलता। तभी चलते-चलते बंशीनाथ अपने परिवार के साथ उसी मन्दिर में पहुँचा, जहाँ कभी हरिनाथ रहा करते थे। संजोग वश उस दिन हरिनाथ के बेटे का जन्मदिन था, इस उपलक्ष्य में हरिनाथ ने मन्दिर में गरीबों के लिये भण्डारे का आयोजन किया था। भूख के लालच में बंशीनाथ अपने परिवार के साथ उस भण्डारे में भोजन ग्रहण करने के लिये बैठा। भोजन वित्रण शुरू हुआ। तभी बंशीनाथ के पास  भोजन परोशने के लिये हरिनाथ पहुँचे। छोटे भाई को अपने पास आता देखकर बंशीनाथ ने अपना मुँह छिपाने की कोशिश कर ही रहे थे कि हरिनाथ ने अपने बड़े भाई को पहचान लिया और उनके चरण-स्पर्श किये। बंशीनाथ अपने किये पर बहुत शर्मिन्दा थे, वो खड़े होकर रोने लगे पर हरिनाथ ने अपने बड़े भाई को गले से लगा लिया। दोनों भाइयों ने भंडारा अपने हाथों से गरीबों को खिलाया। फिर हरिनाथ ने अपने हाथों से अपने बड़े भाई को भोजन कराया।
“जीवन में प्रतिष्ठा पैसे से नहीं,
इंसान के आचरण से होती है।”
हरिनाथ अपने आचरण के लिये जाने जाते थे। दुःखों का भी उन्होंने अपने जीवन में संयम से सामना किया ।
इसलिए कर्म कोई भी करो फल की प्राप्ति इंसान के कर्म के अनुरूप होती है। 
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

Thursday, 12 November 2015

ऐ वक्त जरा ठहर

ऐ वक्त जरा ठहर।
मैं जिन्दगी को जी लूँ।
खुशियों के आँगन में फुर्सत से,
जिन्दगी को गुनगुना लूँ।
हर पल दौड़ भाग में बीत गया,
अब थोड़ा सा सबर लूँ।

ऐ वक्त जरा ठहर ।
मैं इन खुशियों में,
जरा जी भर झूम लूँ।
वो दौड़ भाग को भुलाकर
इन लम्हों को सजा कर,
जिन्दगी के रंगों में मिलाकर।
उम्मीदों को आज रंग दूँ।

ऐ वक्त जरा ठहर।
मैं हर आस को अपना लूँ।
मंजिल की डगर
मुश्किलों से भरी थी,
हर मोड़ मुसीबत से घिरी थी।
हर कदम पर मैं गिरता सम्भलता
मन में उम्मीद को ठान चलता।

ऐ वक्त जरा ठहर ।
मैं अपनी जीत को जी लूँ।
क्या पता आगे क्या लिखा है?
तकदीर के मालिक ने
जो आज दिया है।
ये उपकार मुझ पर
मेरी मेहनत ने किया है।

मुश्किलों को मैने
हिम्मत से सहा है।
हर पलों को मैने
अपनी आदत समझा है।
ये आज में,
मैं पूरी जिन्दगी जी लूँ।
ऐ वक्त जरा ठहर,
मैं सारी कसर दूर कर लूँ।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

“जिन्दगी को लड़ते देखा मैने”

जिन्दगी को अक्सर
लड़ते देखा है मैने।
हर रोज संघर्षो के बीच,
गुजरते देखा है मैने।
हर शख्स को
मंजिल की चाहत में
बढ़ते देखा है मैने।
मुश्किलों को आसान
बनते देखा है मैने।

जिन्दगी को अक्सर
लड़ते देखा है मैने।
हर शख्स काँटों में सफर करते देखा है मैने।
किस्मत के पन्नों में
तकदीर को चमकते देखा है मैने।
जिन्दगी की दौड़ को
हार जीत का सफ़र तय करते देखा है मैने।

जिन्दगी को अक्सर
लड़ते देखा है मैने।
राहगीर को अक्सर,
मंजिल के लिये
भटकते देखा है मैने।
कोशिश के मंत्रो को जप कर,
सफलता को करीब देखा है मैने।

हार का अनुभव और जीत की
चाहत को एक साथ देखा है मैने।
तूफानों में भी जिन्दगी को जीते देखा है मैने।
मेहनत के भागीदारों को
ऊँचाइयों पर चमकते देखा है मैने।

जिन्दगी के दाँव में
किस्मत आजमाते,
लोगों को देखा है मैने।
हर शख्स को भीड़ से
आगे निकलते देखा है मैने।
जिन्दगी को अक्सर
लड़ते देखा है मैने।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट



"सीखता सिखाता, चला मैं चला''

सीखता सिखाता।
मुश्किलों को आसान बनाता,
जिन्दगी का हर गम भुलाता,
धीमी गति से,
अपनी कलम को चलाता।
मंजिल की राहों में
अपना कारवां बढ़ाता।
चला मैं चला..

सीखता सिखाता।
कदम से कदम मिलाता,
मंजिल को अपनी आदत बनाता।
किस्मत के पन्नों में
मेहनत की लिखावट सजाता।
जीवन पथ पर अपनी पहचान बनाता।
चला मैं चला..

कभी घबरा कर,
तो कभी निराश मन से
खुद में खो जाता।
मंजिल को पाने की चाह में
सहसा पुनः खड़ा हो जाता।
मुश्किलों में कोशिश के
हर दाव आजमाता।
कठिनाईयों से सबक ले,
जीवन के विकल्पों का
आनन्द उठाता।
सफलता के हर सुर से
मेहनत की नई ताल मिलाता।
चला मैं चला..

सीखता सिखाता।
हर दिन को एक नई प्रेरणा बनाता।
काँटों में चल कर,
मन की आस को बढ़ाता।
मन ही मन मुस्कुराता।
फिर गुनगुनाता
बस और एक कदम चल,
इसी मंत्र से
खुद को दिलासा दिलाता।
चला मैं चला..

मंजिल को पाकर फूलों की बारिश
में भीगने के लिये,
मन ही मन अपनी उत्सुकता बढ़ाता।
सीखता सिखाता
चला मैं चला..
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट