ऐ वक्त जरा ठहर।
मैं जिन्दगी को जी लूँ।
खुशियों के आँगन में फुर्सत से,
जिन्दगी को गुनगुना लूँ।
हर पल दौड़ भाग में बीत गया,
अब थोड़ा सा सबर लूँ।
ऐ वक्त जरा ठहर ।
मैं इन खुशियों में,
जरा जी भर झूम लूँ।
वो दौड़ भाग को भुलाकर
इन लम्हों को सजा कर,
जिन्दगी के रंगों में मिलाकर।
उम्मीदों को आज रंग दूँ।
ऐ वक्त जरा ठहर।
मैं हर आस को अपना लूँ।
मंजिल की डगर
मुश्किलों से भरी थी,
हर मोड़ मुसीबत से घिरी थी।
हर कदम पर मैं गिरता सम्भलता
मन में उम्मीद को ठान चलता।
ऐ वक्त जरा ठहर ।
मैं अपनी जीत को जी लूँ।
क्या पता आगे क्या लिखा है?
तकदीर के मालिक ने
जो आज दिया है।
ये उपकार मुझ पर
मेरी मेहनत ने किया है।
मुश्किलों को मैने
हिम्मत से सहा है।
हर पलों को मैने
अपनी आदत समझा है।
ये आज में,
मैं पूरी जिन्दगी जी लूँ।
ऐ वक्त जरा ठहर,
मैं सारी कसर दूर कर लूँ।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट
मैं जिन्दगी को जी लूँ।
खुशियों के आँगन में फुर्सत से,
जिन्दगी को गुनगुना लूँ।
हर पल दौड़ भाग में बीत गया,
अब थोड़ा सा सबर लूँ।
ऐ वक्त जरा ठहर ।
मैं इन खुशियों में,
जरा जी भर झूम लूँ।
वो दौड़ भाग को भुलाकर
इन लम्हों को सजा कर,
जिन्दगी के रंगों में मिलाकर।
उम्मीदों को आज रंग दूँ।
ऐ वक्त जरा ठहर।
मैं हर आस को अपना लूँ।
मंजिल की डगर
मुश्किलों से भरी थी,
हर मोड़ मुसीबत से घिरी थी।
हर कदम पर मैं गिरता सम्भलता
मन में उम्मीद को ठान चलता।
ऐ वक्त जरा ठहर ।
मैं अपनी जीत को जी लूँ।
क्या पता आगे क्या लिखा है?
तकदीर के मालिक ने
जो आज दिया है।
ये उपकार मुझ पर
मेरी मेहनत ने किया है।
मुश्किलों को मैने
हिम्मत से सहा है।
हर पलों को मैने
अपनी आदत समझा है।
ये आज में,
मैं पूरी जिन्दगी जी लूँ।
ऐ वक्त जरा ठहर,
मैं सारी कसर दूर कर लूँ।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट
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