ना रीत है ना प्रीत है।
दहेज प्रथा समाज में चला रहे
कुछ लोगों की ये गलत नीत है।
कहावते तो अनेक हैं
पर उनमें से ये एक है।
बेटी का घर मायका नहीं ससुराल है।
फिर दहेज़ क्यों देना होता है?
जब बेटी का घर ससुराल होता है।
बुजदिल है वो पिता,
जो अपनी बेटी को बोझ समझता है।
लोभी है वो पिता,
जो अपने बेटे की आढ़ में दहेज़ लेता है।
क्यों आप दहेज़ का प्रलोभन देकर
किसी बेटे को कमजोर कर रहे हो।
क्यों तुम दहेज़ माँग कर
किसी बेटी को मजबूर कर रहे हो।
दहेज़ देना भी पाप है,
दहेज़ लेना भी पाप है।
दहेज़ दो घरो का जोड़ नहीं,
ये समाज का कोढ़ है।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट।
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