दफ्तर से घर वापस आया।
चेहरा देख मेरा मुरझाया।
दर्द में माँ ने मुझको पाया।
बोली माँ लाड़ लगाकर,
सीने से माँ मुझे लगाकर।
इतना गुमसुम क्यों है लाल,
क्यों उड़ा है, चेहरे का गुलाल।
नन्हा सा तू मेरा मुन्ना।
क्यों है फिर तू इतना सुना सुना।
सिर दुःख रहा है,
माँ से बोला।
दुःख से मुझे दुःखी देखकर।
फिर माँ ने मुझे बैठाया,
प्यार से सिर पे हाथ घुमाया।
तब जा कर के सुकून पाया।
दुःख मेरा नहीं देखा जाता।
जब तक मै घर वापस नहीं आता।
माँ के मन को चैन नहीं आता।
माँ का लाड़ मुझे है भाता।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

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