अपनी धुन में गाये बचपन।
दादा की गोद झुलाये बचपन।
पापा की अँगुली थाम कर।
फिर से कदम मिलाये बचपन।
काश कि, लौट आये बचपन।
क्या सुख है, क्या दुःख है
इसकी चाह को भुलकर ,
माँ के आँचल को अपनाकर,
फिर से लाड़ लड़ाये बचपन।
काश कि, लौट आये बचपन।
चन्दा की लोरी गा कर,
नन्हे कान्हा का रूप बनाये बचपन।
खुशियों में खुश होकर,
नटखट बाल लीला दिखाये बचपन।
काश कि, लौट आये बचपन।
क्या दौलत क्या शोहरत,
इसकी लालशा से दूर,
केवल माँ के प्यार की
पूँजी पाये बचपन।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट
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