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Tuesday, 17 November 2015

चेहरे

अक्सर चेहरे पढ़ने में,
हर बार ग़लतियाँ कर जाता हूँ।
जो बात किताबों में ना लिखी हो,
वो बात चेहरों के
उतरते नकाबों से सीख जाता हूँ।
चेहरे तो कम हैं यहाँ।
जो मिलते हैं
वो नकाबों से ढके हैं।
बिना बोले बड़े बोल,
बोल जाते हैं कुछ चेहरे।
कुछ बोल कर भी
खामोश कर जाते हैं चेहरे।
हर चेहरा यहाँ
बहुत कुछ सीखा जाता है।
कोई खुशी के बाद गम,
तो कोई गम के बाद
जीना सीखाता है।
चमकीले चेहरे अक्सर
जिन्दगी को सामने से
बहुत लुभाते हैं।
पर हक़ीकतों में
हर शख़्स को
उसकी राह से भटकाते हैं।
सबक़ मिलने पर भी
अक्सर चेहरे पढ़ने में,
हर बार ग़लतियाँ कर जाता हूँ,।
 धीरेन्द्र सिंह बिष्ट
16.11.2015

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