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Friday, 13 November 2015

शनिवार का दिन

कहानी का सारांश :
इस कहानी में केवल एक शनिवार के दिन का वर्णन किया है। कहानी में मुख्य भूमिका एक नन्हे बालक की है। बालक अपने बालपन के कारण अपनी पढ़ाई के प्रति थोड़ा लापरवाह है। किन्तु बालक के मन में पिता के प्रति उनकी आज्ञा का पालन और उनके अनुशासन का डर का वर्णन कहानी में किया है। दूसरी भूमिका पथ-प्रदर्शन के तौर पर बालक के पिता भानु प्रताप की है। भानु प्रताप अपने बेटे को बहुत प्रेम करते हैं, किन्तु वह अपने पुत्र को ज्यादा लाड़ नहीं लड़ाते, वह इस बात से भली भाँति परिचित है ज्यादा लाड़ लड़ाने से उनका बेटा बिगड़ सकता है। इसीलिये बेटे के प्रति मन में प्रेम की भावना और मुँख पर एक कड़ा अनुशासन की भूमिका निभाते हैं। जिससे उनका बेटा आगे चल कर एक अच्छे पथ पर अपनी पहचान कायम करता है।

        शनिवार का दिन है। हल्की सी शीत लहर बह रही है। आसमान साफ है पक्षी रोज की तरह अपने समूह में अपने भोजन की तलाश में निकल रहे हैं। मैं एक टक गर्दन ऊपर किये उनको देख रहा हूँ। और मुस्कुरा कर उनको देखता हूँ, यह बात सोच कर मन ही मन निराश भी हो रहा हूँ, ”रोज की तरह आज भी स्कूल जाना है”
माँ ने स्कूल के लिये तैयार किया। किन्तु मेरा मन स्कूल जाने का नहीं था। तभी मैने बुखार का बहाना बना लिया, पर मेरा झूठ पापा के सामने नहीं चलने वाला।
पापा ने गुस्से से कहा- ”स्कूल जाता है या मैं ले जाऊ।”
मेरे लिये इतना ही सुनना काफी था। माँ ने स्कूल बैग और मेरा टिफिन दिया और मैं स्कूल के लिये निकला। आगे जा कर रस्ते में मेरे स्कूल के और भी दोस्त मिले, उनमें से दीपक मेरा बहुत प्रिय मित्र था।
दीपक-”मास्टर जी ने होम वर्क दिया था, कविता याद की या फिर भूल गया।”
तभी मैं अचानक दीपक की बात सुनकर और ज्यादा डर गया और मन ही मन सोचने लगा। ”आज फिर से स्कूल में मास्टर जी द्वारा मुर्गा बनना पड़ेगा।
इतने में दीपक बोला, ”क्या सोच रहा है? कुछ पूछा था, उसका जवाब दिये बिना कहा खो गया।
रोज की तरह आज भी मेरा जवाब नहीं था।
दीपक-”जल्दी चल स्कूल के लिये देर हो रही है।”
मेरा मन स्कूल जाने का बिल्कुल नहीं था, और मैं दीपक से बोला, ”क्यों ना आज पास के तालाब में मछलियाँ पकड़ने चलें।”
दीपक- ”अरे नहीं नहीं मास्टर जी के हाथ मुझे नहीं पिटना है, तू जा मुझे स्कूल जाना है।”
दीपक के बात सुनकर मैं बोला, ”अरे कल रविवार है, मास्टर जी सोमवार तक भूल जाएँगे।”
पहले तो दीपक मेरी बात को नकारता रहा, फिर किसी तरह मैने उसे मना लिया।आखिर वो मेरा सबसे प्रिय दोस्त जो था। तालाब के पास पुरे दिन खेलते रहे। जैसे-जैसे दिन ढलने लगा फिर घर की याद आई।
”चल अब घर चल शाम होने को है” ऐसा मैं दीपक से बोला।
आज में मन ही मन खुश था, मुर्गा बनने से बच गया। किन्तु जब घर पहुँचा तो मास्टर जी और आस पड़ोस के दो-चार लोगों को घर में पाया देख, मेरे पैरों तले जमींन खिसक गई।

(उस दिन को मैं आज भी आज तक नहीं भुला, जब भी किसी स्कूल के बच्चे को देखता हूँ, तो एक पल के लिये अपने बीते दिनों में खो जाता हूँ।)
मास्टर जी- ” बेटा कहाँ थे, आप और दीपक पुरे दिन?” मैं चुप्पी साध के अपने जूते के तनों को देख रहा था।
तभी पापा गुस्से में, ”मोहित बताओगे या फिर छड़ी निकालूँ”।
पापा के डर के कारण मैने सारी बात सच-सच बता दी।
मास्टर जी ने दो-चार ज्ञान की बात बताई और समझाया। फिर सभी लोग अपने अपने घर को चले गये।
इधर पापा को मेरी हरकतों से बहुत क्रोध आया था। पापा ने मेरी बहुत पिटाई की। फिर थोड़ी देर बात प्यार करने लगे। और बहुत सारी बातें समझाने लगे।
उस दिन से मैने स्कूल का कोई भी दिन गोल नहीं किया। समझ की कमी होने से तब मुझे स्कूल जाना और घर पर पढ़ना गन्दा लगता था। तब मुझे ना ही समय का अहसास था और ना ही मेरी पढ़ाई का। किन्तु आज सोचता हूँ, कि मम्मी-पापा ने जो भी किया वो मेरे आज और आने वाले भविष्य के लिये किया।
”समय कभी भी इंसान को वर्तमान का अहसास नहीं कराता,
किन्तु भविष्य, भूतकाल की बातों पर हमें जरूर पश्चाताप कराता है।”
पापा का अनुशासन मेरे लिये एक पथ-प्रदर्शक साबित हुआ।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

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