हे इंसान, है क्यों,
तू इतना परेशान।
सुख में भी
और दुख में भी।
आखिर क्या है,
तेरे अरमान।
दूसरा सुखी है
पर क्यों तू दुखी है।
दूसरा दुखी है,
पर क्यों तू सुखी है।
हे इंसान, है क्यों,
तू इतना परेशान।
दूसरों पे भेद भाव
क्यों करता है।
आखिर हम सब हैं
कुदरत की सन्तान।
क्या पाया, क्या खोया,
उसका तुझे गम नहीं।
खुद तू कुछ कर नहीं पाया।
जो मेहनत करे,
वो तुझको नहीं भाया।
अपनों को गिरा कर,
खुद को आगे बड़ा कर।
किया तूने अपमान।
हे इंसान,
क्या है तेरे अरमान।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट
तू इतना परेशान।
सुख में भी
और दुख में भी।
आखिर क्या है,
तेरे अरमान।
दूसरा सुखी है
पर क्यों तू दुखी है।
दूसरा दुखी है,
पर क्यों तू सुखी है।
हे इंसान, है क्यों,
तू इतना परेशान।
दूसरों पे भेद भाव
क्यों करता है।
आखिर हम सब हैं
कुदरत की सन्तान।
क्या पाया, क्या खोया,
उसका तुझे गम नहीं।
खुद तू कुछ कर नहीं पाया।
जो मेहनत करे,
वो तुझको नहीं भाया।
अपनों को गिरा कर,
खुद को आगे बड़ा कर।
किया तूने अपमान।
हे इंसान,
क्या है तेरे अरमान।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट
No comments:
Post a Comment