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Thursday, 12 November 2015

"सीखता सिखाता, चला मैं चला''

सीखता सिखाता।
मुश्किलों को आसान बनाता,
जिन्दगी का हर गम भुलाता,
धीमी गति से,
अपनी कलम को चलाता।
मंजिल की राहों में
अपना कारवां बढ़ाता।
चला मैं चला..

सीखता सिखाता।
कदम से कदम मिलाता,
मंजिल को अपनी आदत बनाता।
किस्मत के पन्नों में
मेहनत की लिखावट सजाता।
जीवन पथ पर अपनी पहचान बनाता।
चला मैं चला..

कभी घबरा कर,
तो कभी निराश मन से
खुद में खो जाता।
मंजिल को पाने की चाह में
सहसा पुनः खड़ा हो जाता।
मुश्किलों में कोशिश के
हर दाव आजमाता।
कठिनाईयों से सबक ले,
जीवन के विकल्पों का
आनन्द उठाता।
सफलता के हर सुर से
मेहनत की नई ताल मिलाता।
चला मैं चला..

सीखता सिखाता।
हर दिन को एक नई प्रेरणा बनाता।
काँटों में चल कर,
मन की आस को बढ़ाता।
मन ही मन मुस्कुराता।
फिर गुनगुनाता
बस और एक कदम चल,
इसी मंत्र से
खुद को दिलासा दिलाता।
चला मैं चला..

मंजिल को पाकर फूलों की बारिश
में भीगने के लिये,
मन ही मन अपनी उत्सुकता बढ़ाता।
सीखता सिखाता
चला मैं चला..
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

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