Check out my book on YourQuote. Recently published with YourQuote. click the link: https://www.yourquote.in/dhirendra-bisht-de4h/books/kuch-is-trh-jindgii-ck9

Thursday, 12 November 2015

“जिन्दगी को लड़ते देखा मैने”

जिन्दगी को अक्सर
लड़ते देखा है मैने।
हर रोज संघर्षो के बीच,
गुजरते देखा है मैने।
हर शख्स को
मंजिल की चाहत में
बढ़ते देखा है मैने।
मुश्किलों को आसान
बनते देखा है मैने।

जिन्दगी को अक्सर
लड़ते देखा है मैने।
हर शख्स काँटों में सफर करते देखा है मैने।
किस्मत के पन्नों में
तकदीर को चमकते देखा है मैने।
जिन्दगी की दौड़ को
हार जीत का सफ़र तय करते देखा है मैने।

जिन्दगी को अक्सर
लड़ते देखा है मैने।
राहगीर को अक्सर,
मंजिल के लिये
भटकते देखा है मैने।
कोशिश के मंत्रो को जप कर,
सफलता को करीब देखा है मैने।

हार का अनुभव और जीत की
चाहत को एक साथ देखा है मैने।
तूफानों में भी जिन्दगी को जीते देखा है मैने।
मेहनत के भागीदारों को
ऊँचाइयों पर चमकते देखा है मैने।

जिन्दगी के दाँव में
किस्मत आजमाते,
लोगों को देखा है मैने।
हर शख्स को भीड़ से
आगे निकलते देखा है मैने।
जिन्दगी को अक्सर
लड़ते देखा है मैने।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट



No comments:

Post a Comment