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Tuesday, 17 November 2015

"कुछ कहना चाहती है जिन्दगी''

कुछ कहना चाहती है जिन्दगी।
सपनो को पूरा कर,
एक नई मिसाल बनना चाहती
है जिन्दगी।
मंजिल का सफर तय कर,
जीवन में उपलब्धियां
हासिल करना चाहती है जिन्दगी।

कुछ कहना चाहती है जिन्दगी।
भीड़ को पीछे छोड़ कर,
आगे बढ़ना चाहती है जिन्दगी।
मंजिल की डगर मुश्किल है मगर,
चलना है सम्भलकर।
शायद ये बात बताना
चाहती है जिन्दगी।

अकसर हार कर,
बैठ जाता हूँ यूँ ही।
मन में सपनों की दुनिया
बनाता हूँ यूँ ही।
मेरी हार ही मेरी जीत तय करेगी।
इस बात को उम्मीद बनाकर।
जीवन के समुन्दर में
कोशिशों के गोते लगाता हूँ यूँ ही।

इन सब की चाह में
जिन्दगी कितना कुछ सिखाती है।
मंजिल को पाने की राह में
जिन्दगी कैसे
कैसे दिन दिखाती है।
घबरा के सबर पा लिया।
कुछ पाकर कुछ खो लिया।
कभी रो लिया कभी हँस लिया।
जिन्दगी ने जो प्यार से दिया,
उसको मैने कबूल किया।

खो कर पाना अच्छा लगता है।
पर किसी बात को भुलाकर
दोहराना बुरा लगता है।
जिन्दगी ये सब बताना चाहती है,
मुश्किलों को आसान बनाना चाहती है।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

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