Check out my book on YourQuote. Recently published with YourQuote. click the link: https://www.yourquote.in/dhirendra-bisht-de4h/books/kuch-is-trh-jindgii-ck9

Tuesday, 17 November 2015

"आईना हूँ मैं,"

आईना हूँ मैं,
उस चेहरे का।
जो चेहरा अपनी चमक पहचानता है।
सीसा नहीं हूँ मैं।
जो पत्थर से तोड़ दिया जाता है।

दीपक हूँ उस शाम का,
जो अज्ञान की रातों में
जला के छोड़ दिया जाता है।
लौ हूँ मैं
उस ज्ञान की बाती का।
जो जला कर छोड़ दिया जाता है।

मेरी कोशिश
मेरी करनी है।
मेरी कामयाबी
मेरी सोच है।
मुश्किल है सफर,
पर तय करना जरूर है।

आईना हूँ मैं
उस चेहरे का।
जो चेहरा अपनी पहचान बनाना जनता है।
वो काँच नहीं मैं।
जो आँखों में चुभना जनता है।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

No comments:

Post a Comment