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Friday, 13 November 2015

बेटी एक चहल

बेटी एक चहल है,
बेटी एक पहल है।
बेटी ही आज है,
बेटी ही कल है।
बेटी आश है,
समाज का विकास है।
अगर ऐसी सोच
सभी की हो जाये।
हर घर को बेटी महकाए।
बेटी में कई रूप समाये।

बेटी एक पहल है,
हर दुविधा का हल है।
कभी माँ तो कभी बहन है,
कभी पत्नी तो कभी बहु,
बेटी समाज का आधार है।
बेटी करुणा और प्यार है।
बेटी समाज की डोर है,
हर पहलू की छोर है।

बेटी एक चहल है,
सृष्टि की रचना की पहल है।
बेटी नहीं तो जग नहीं।
आने वाला कोई युग नहीं।
बेटी ने किया उपकार मुझ पर।
कभी माँ बनकर जन्म दिया,
कभी बहन के रूप में,
बहन का प्यार दिया।
तो कभी पथिक बनकर,
जीवन के सफर में साथ दिया।
नमन् करूँ हर बेटी को मै।
जिसने स्वयं दुःख पाकर,
हम सभी को सुख दिया।

बेटी है तो जग है
हर राह है हर पग है।
आओ प्रण करें सब मिलकर,
बेटी का सम्मान बढ़ाएँ,
कुरीतियों को जड़ से मिटायें।
बेटी निर्मल है,
बेटी आज है,
बेटी कल है।
©धीरेन्द्र सिंह बिष्ट
28.09.2015

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