निकल पड़ा हूँ,
हसीन जिन्दगी की तलाश में।
बेचैन मन ये
तब से अब तक,
कि मन की उम्मीद पा ना लूँ।
अब रोके ना रुकूँ मैं।
जब तक जिन्दगी को
हसीन लम्हों से सजा ना लूँ।
निकल पड़ा हूँ,
जिन्दगी के नये अन्दाज में।
जिन्दगी के इस आज को
आने वाले सुनहरे पलों की
एक नई मिसाल बना लूँ।
जिन्दगी को और भी
अब खूबसूरत बना लूँ।
आसान नहीं, हसीन
लम्हों का ये सफर।
हर राह, हर मोड़ पर है
जख्मों का नया कहर।
बेख़ौफ मैं भी इस मंज़र से निकलता,
मन में अरमानों का दीया
जला के चलता।
निकल पड़ा हूँ,
हसीन जिन्दगी की तलाश में।
बस हसीन पलों की आस में
हर रोज आगे बढ़ता।
जीवन की मुश्किलों से लड़ता।
मंजिल को पाने की चाह में,
कठिनाइयों का पीछा करता।
निकल पड़ा हूँ,
हसीन जिन्दगी की तलाश में।
दूर से देखा जिन्दगी को
दिखने में हसीन है।
जितना पास आये जिन्दगी के
ये उतनी ही बेहतरीन है।
लम्हें बहुत हैं जिन्दगी में,
हर लम्हा बहुत कुछ सिखाता।
जिन्दगी की दौड़ में
मुझे हर बात का अहसास कराता।
अब तो जिन्दगी और भी
हसीन सी लगने लगी है।
रंगीन पलों की चाह में,
हर रोज मन को मना कर
मैं आगे बढ़ा हूँ।
ख्वाबों को सच कर,
अब मंजिल के पास खड़ा हूँ।
हसीन जिन्दगी की तलाश में।
अब निकल पड़ा हूँ।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट
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