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Friday, 13 November 2015

मतलबी दौर

मलतब के लोगों में
अजनबी सा खुद को
लगने लगा हूँ।
बदलते वक्त के दौर में
पाकर भी सब कुछ खोने लगा हूँ।
ऐसी सौहरत का भी क्या कहना,
जिनको पाकर खुद को
अपनों से दूर करना।
हर पलों को मैंने अपना बनाया।
आने वाले दौर के लिये,
उस वक्त को अपनी यादों में सजाया।
उम्मीद से ज्यादा जिसे
अपना समझने लगे,
पर बदलते दौर में वो
शब्दों के नये तीर चुभोने लगे।
तब से अब तक
वफा के नाम से ही
मैं डरने लगा हूँ।
मतलबी लोगों के नाम से,
मैं डर कर काँपने लगा हूँ।
अक्सर जरूरतों में जो,
अपनी फ़रियाद सुनाया करते थे।
पर बदलते वक्त के दौर में,
आज खुद को वक्त का
विधाता समझने लगे हैं।
हर पल को हमने अपनी
इबादत समझ कर सींचा।
वही पल आज
एक मतलबी दौर सा लगने लगा है।
मलतब के लोगों में
अजनबी सा खुद को
लगने लगा हूँ।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

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