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Friday, 13 November 2015

“गुमसुम मंजिल”

मंजिल क्यों आज
गुमसुम सी लगने लगी है।
हर कोशिश,
आज यूँ नाकाम सी
लगने लगी है।
अब और इम्तिहान ना ले,
मेरी तकदीर के ऐ मालिक।
मैं इतना भी मजबूत नहीं।
जो तेरी परख का इम्तिहान दे सकूँ।

मंजिल क्यों आज गुमसुम
सी लगने लगी है।
हर उम्मीद की किरण
क्यों आज ढलने लगी है।
कोशिश के साथ आज,
मैं आस लगाये खड़ा हूँ।
अपनी मंजिल की चाह में
उम्मीदों का दामन फैलाये खड़ा हूँ।
राह की मुश्किलों ने झिजोड़ा
हर कदम पे ठोकरों ने तोड़ा ,

मंजिल क्यों आज
गुमसुम सी लगने लगी है।
इन्तजार की घड़ी अब क्यों
बढ़ने लगी है।
अब और इन्तजार मुझे
भाता नहीं।
बीता हुआ समय कभी
लौट कर आता नहीं।
दुःखों का वो सफर,
सुख पाने की चाह में
भुला दिया हमने।

वक्त के आगे कमजोर से
यूँ पड़ने लगे हैं हम।
खुद को मनाते,
हर गम भुलाते
मन में हर आस जागाते
बढ़े हैं हम।
दुःख को सबक और
सुख को सीख समझकर
हर रीत निभाते चले हैं हम।
मंजिल क्यों आज गुमसुम सी लगने लगी है।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

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