Check out my book on YourQuote. Recently published with YourQuote. click the link: https://www.yourquote.in/dhirendra-bisht-de4h/books/kuch-is-trh-jindgii-ck9

Tuesday, 17 November 2015

"मन की लालसा"

मन की लालसा ने मुझे पुकारा।
छू ले गगन, बन एक तारा।
रोशन कर दे इस जग को तू।
बन सबकी उम्मीदों का सितारा।

अरमान तो दिल में बहुत हैं, तेरे।
पर ये है मंजिल का नया इशारा।
मन की लालसा ने मुझे पुकारा।
बन जगत का तारा।

हार मान ना होना तू।
बनना है तुझे, सबका सहारा।
किया सफर, जो राहों में तू ने।
वो मंजिल की डगर अब दूर नहीं।
जलाता जा यूँ दीपक आशाओं के मन में।
मंजिल से अब तू दूर नहीं।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

No comments:

Post a Comment