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Tuesday, 17 November 2015

"बाल मजदूरी"

घर से मंजिल की तरफ निकला।
राह में एक ढाबा मिला।
ढाबों में कुछ नन्हें सितारों से मिला।
देख कर उनकी ये दशा,
मन को उस पल शुकून ना मिला।

एक फेरी के गाने गा रहा।
तो एक बर्तन के बाजे बजा रहा।
ना तन पर हैं पूरे कपड़े,
ना पैरों पर हैं उनके जूता।

हाथों में हैं छाले।
कलम किताबों की जगह,
थमा दिए हैं चाय के प्याले।
एक किस्मत की लकीरों से,
मेज की जूठन मिटा रहा।
तो एक चूल्हे में अपनी किस्मत जला रहा।

तभी सोचा देश की नींव ऐसी,
तो इमारत होगी कैसी।
देखा तो क्या देखा।
भविष्य देश का अंधियारे में देखा।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

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