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Tuesday, 17 November 2015

"खामोशी बहुत कुछ बोलती है"

खामोशी बहुत कुछ बोलती है।
लोगों के दिल का राज खोलती है।
बिन कहे बहुत कुछ कह जाते हैं लोग,
बहुत कुछ बोलकर भी

खामोश हो जाते हैं लोग।
ऐसा क्या है ख़ामोशी में?
जो दिल का हाल बयां कर,
दिल में दस्तक दे जाती है।

खामोशी बहुत कुछ बोलती है।
वो शख्स भी बोल कर,
खामोश रह गया।
जो मेरे अन्दाज को,
मेरी ख़ामोशी समझ गया।

उसे क्या पता,
उसका बोलना भाता था हमको।
ना चाह कर भी,
खामोश रहना आता था हमको।

तब मेरी ख़ामोशी को
समझ लेता था वो शख्स।
पर आज सुनकर भी
अनसुना कर जाता है वो शख्स।

खामोश रहना छोड़ दिया हमने।
बीते पलों के बारे में
सोचना छोड़ दिया हमने।
वो ख़ामोशी बहुत कुछ दिखा गई।
मंजिल की दौड़ में आगे बढ़ना सीखा गई।
©धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

27.09.2015/5:00 pm

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