Check out my book on YourQuote. Recently published with YourQuote. click the link: https://www.yourquote.in/dhirendra-bisht-de4h/books/kuch-is-trh-jindgii-ck9

Friday, 20 November 2015

"मैं सहमा सा, गुमसुम सा''

आज मैं सहमा सा,
आज कुछ डरा सा।
जिन्दगी की राहों में
कुछ यूँ ही अनमना सा।
जाने क्यों मैं खोया सा।
खुली आँखों से सोया सा।
जिन्दगी की जीत के लिये,
मन को सपनों में डुबोया सा।
हर उम्मीद को आस में संजोया सा।
आज मैं सहमा सा।

इस हालात के लिये
कितना सोचूँ।
कभी खुद को तो कभी
अपनी मेहनत को दोषू,
जिन्दगी की चाह के लिये,
कोशिशों की धुन बनाता।
हर मुश्किलों में
खुद को आजमाता।
मन के मत को मैं मनाता ।

आज मैं सहमा सा,
आज मैं गुमसुम सा।
मेहनत की राहों में,
कोशिशों के बोये बीज
इन्तजार की घड़ी में क्यों छिपने लगे हैं।
अब आस है उन बीजों से।
जो उम्मीद के अंकुर से
सफलता के पेड़ बन जाये।
जो सोचा है
जिन्दगी के लिये मैने,
काश मंजिल आसान हो जाये।

वक्त का दौर अब मुझे सताता,
मेरी उम्मीदों के लिये हर रोज डराता।
मेरी आस को कमजोर बनाता।
इन पलों में, क्यों मैं ऐसा?
कभी अनमना तो कभी डरा सा,
आज मैं सहमा सा।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

No comments:

Post a Comment