''Explain to the person that can get an understanding of good and bad.''
-- Dhir
Monday, 29 August 2016
Tuesday, 23 August 2016
धुन
Wednesday, 10 August 2016
Tuesday, 9 August 2016
Wednesday, 22 June 2016
''साथ जिंदगी भर का"
''किसी का साथ जिंदगी भर का हो ना हो,
पर यादें अकसर जिंदगी भर का साथ निभाती हैं।"
-- ''धीरेन्द्र'' (धीर)
Monday, 20 June 2016
Saturday, 11 June 2016
"मुश्किलों का साथ''
कोई साथ हो ना हो, पर मुश्किलें साथ हैं।
"साथ लोगों को अक्सर कमजोर बनाता है,
पर मुश्किलें हर कदम पर हौसला बढ़ाती है।''
-- ''धीरेन्द्र'' (धीर)
Sunday, 5 June 2016
Saturday, 28 May 2016
एक दिन जिन्दगी का
अगर सफर कर लो एक दिन जिंदगी का मुश्किल भरा,
तो ज़िन्दगी सालों तक खुशियाँ ले आती है मुफ़्त में।
-- ''धीरेंद्र" (धीर)
Friday, 27 May 2016
इंसानियत
पैसों से ज्यादा इंसानियत कमा के रखो!
वक्त बदलने पर पैसा नहीं, इंसानियत काम आती है।
-- "धीरेंद्र'' (धीर)
Monday, 23 May 2016
सफर सुहाना
जिन्दगी कोे ऐसे जाना,
जैसे कोई सफर था सुहाना।
कुछ रास्तों नेे इस कदर पहचाना,
लिखेगा ''धीर'' कोई अफ़साना।
उस कल में मैं यूँ खोया,
गोया सुर कोई, मेरे मन ने संजोया।
वो पागलपन था या जूनून,
ये तय कर पाना मुश्किल था।
बस यही चाहत थी मन।
कुछ कर दिखाऊँ।
हर हद से गुजर।
''ऐ जिन्दगी! बस तुझमें निखार लाऊँ।''
कोई हँसता, हालात पर मेरी,
और कोई देख तरसता, लगन को मेरी।
सपनो ने, दिन को रात
और रातों को दिन बनाया।
पाने की धुन में, हाय!
उस पल ने आँसूओं से मुँह धुलाया।
-- ''धीरेन्द्र'' (धीर)
Wednesday, 18 May 2016
समय और साथ
कभी वक्त था, किसी अजनबी को अपना बनाने का। आज अजनबी अपना हुआ, पर समय नहीं है उनका साथ निभाने को। -- ''धीरेन्द्र'' (धीर)
Thursday, 12 May 2016
फूलों सी, ये "जिन्दगी'
फूलों सी ये जिन्दगी...(१)
हर पल कोशिशों के आगाज में,
खव्हिशों में डूबी जिन्दगी...(२)
मैं मुसाफिर मंजिल का
हर राह, चाह की एक नई किरण...(३)
पल पल नया एहसास है,
हर मुश्किल के बाद एक आस है...(४)
कोई पास तो कोई दूर,
कुछ मगरूर, तो कुछ मजबूर...(५)
दूर है मंजिल अभी,
पर मैं उसके के करीब हूँ...(६)
सीखे हुनर जिंदगी से मैने,
मैं बड़ा खुश नसीब हूँ...(७)
-- "धीरेन्द्र'' (धीर)
Monday, 9 May 2016
''ख्वाहिशों में डूबी जिन्दगी''
कभी हंस लिया करते थे ,
और आज, रोना ही भूल गए हम।
कदम से कदम मिलाते थे,
जाने क्यों? चलना भूल गए हम।
जिन्दगी को समझना चाहते थे,
फिर कहाँ आ कर उलझ गए हम।
प्यार की बारिश में भीगा करते थे,
फिर क्यों नफरत की आग में झुलस गए हम।
ख्वाहिशों में डूबी थी जिन्दगी,
जाने क्यों भावनाओं में बह गए हम।
-- "धीरेन्द्र'' (धीर)
Friday, 6 May 2016
Tuesday, 26 April 2016
''कुछ इस तरह जिन्दगी''
प्यार तो फूलों से था,
मगर काँटों ने हमें चुना..(१)
दोस्ती जहाँ से की,
मगर दुश्मन, जमाने ने हमको चुना..(२)
थोड़ा क्या हँस दिये हम,
लोगों ने (हँसी) हिसाब माँगना शुरू कर दिया..(३)
जितना सुलझते आये हम,
जिन्दगी ने उतना ही उलझना शुरू कर दिया..(४)
रश्म (दोस्ती) दिलों जां से निभाते आये,
बदले में आखों को बरसना पड़ा..(५)
-- ''धीरेन्द्र'' (धीर)
Sunday, 24 April 2016
खुद से जीतता, हारता
खुद ही से जीतता,
खुद ही से हारता।
मुश्किलों में मन,
मेरी उम्मीद को निहारता...
जाने आज का भी क्या इरादा है,
कोशिशों की कतार इस कदर कम
तो बुलंदियों को पाने की ज्यादा।
मुश्किलें भी हर पल
कितना कुछ जताती हैं।
आज बिखरना तो
कल मुझमें निखार लाती।
वक्त पर तो मेरा जोर नहीं,
बस खुद पर भरोसा है।
खुद ही से रूठता, खुद को मनाता।
गमजदा ये मन , जाने कितने अरमान सजाता।
आज को देखूँ तो,
अतीत याद आता है।
अतीत ही अक्सर मुझे बुंलदियों तक ले जाता है।
-- ''धीरेन्द्र'' (धीर)
Friday, 1 April 2016
हवा का झोंका
तूफान तो ना था वो...
शायद हवा का झोंका था।
जिसे जिन्दगी की डोर (प्यार)
समझ बैठा था।
शायद वो मेरे मन का धोखा था।
मंजिल का जरिया,
जिसे समझ बैठा था।
वो जिन्दगी का सबसे
उदासीन तोहफा था।
दिल तो ना टूटा,
पर मेरे अरमान जरूर टूटे।
बेपरवाह जज़्बात के आसूँ,
नम आँखों से फूटे।
मन में कभी हलचल करने वाला शहर,
अब वीरान सा लगने लगा।
धड़कनें शोरगुल शहर में खोकर,
एक नई दुनिया खोजने लगी।
जाने वो पल क्यों ऐसा,
कुछ अनसुलझी पहेली जैसा।
जिसे मैं उस रोज सुलझाता,
वो सुलझती और मैं उलझ जाता।
-- ''धीरेन्द्र'' (धीर)


