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Tuesday, 18 April 2017

"जी लूं हर दिन को नये सिरे से मैं"

जी लूं  हर दिन को नये सिरे से मैं,
अभी रात जिंदगी मे बाकि हैं!

कुछ हिसाब माँग लिए आज जिंदगी से,
कुछ और करने अभी बाकि हैं!

जिये हज़ार गम जिंदगी मे,
बस अब खुशियाँ ही बाकि हैं!

भीग लिए नफरत की बारिश मे,
छाँव प्यार की अभी बाकि है!

लिख लिए सफ़र के गीत,
अब ख़ुशियों मे गुनगुनाने बाकि है!

जी लूँ हर दिन को नये सिरे से मैं,
अभी जिंदगी मे रात बाकि हैं!
-- Dhirendra S. Bisht (Dhir)





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