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Sunday, 2 April 2017

ज़िंदगी की बागडोर

ज़िंदगी की बागडोर जब से संभाली है,
तब से आज तक लोगों की कसर का जवाब नही|

कोई हौसले बढ़ाने तो कोई गिरने मे,
आज के जमाने का कोई हिसाब नही है|

असर हम पर भी इन बातों का कभी हुआ नहीं,
क्योंकि सपनों ने पहले से अपना जो बनना रखा है|

कौन नही मानता है?
लोग अनुभवी नही हैं आज समय मे |

बस ये तर्क और कुतर्क
कभी-कभार समझने वालों से उनकी समझ का इम्तिहान ले लेते  हैं|

कोशिश तो खूब की आज के जमाने मे,
अक्सर भागीदारी उनकी रही है जिंदगी मे,
बिना परख जाने हम मे कमियाँ दिखाने की|

शिकायत हुई नहीं थी कल तलक किसी को जमाने मे,
फिर क्यूँ हुई "धीर" के आज को बेहतर बनाने मे|
-- धीरेन्द्र (धीर)..,

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