गर दर्द ही जिंदगी है,
तो घाव को क्या देखना!
गर राह काँटों से भरी है,
तो पैरों में क्या देखना!
अगर धूप जिंदगी में खिली हो,
तो छाँव की क्या सोचना!
गर लक्ष्य खुद को ही पाना है,
तो सफ़र में, किसी का साथ क्या सोचना!
जैसा आज है मुसाफिर,
उससे बेहतर कल को सोचना!
गर दर्द ही जिंदगी है,
तो घाव को क्या देखना!
-- धीर (धीरेन्द्र)...,
तो घाव को क्या देखना!
गर राह काँटों से भरी है,
तो पैरों में क्या देखना!
अगर धूप जिंदगी में खिली हो,
तो छाँव की क्या सोचना!
गर लक्ष्य खुद को ही पाना है,
तो सफ़र में, किसी का साथ क्या सोचना!
जैसा आज है मुसाफिर,
उससे बेहतर कल को सोचना!
गर दर्द ही जिंदगी है,
तो घाव को क्या देखना!
-- धीर (धीरेन्द्र)...,

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