जल रहा हूँ हर रोज़ जिंदगी में,
जाने क्यूँ आज बुझा सा हूँ!
ख्वाहिशों के शहर में होकर आज,
क्यूँ खुद को अधूरा सा लग रहा हूँ!
जीत रहा हूँ हर ग़म ज़िंदगी के,
जाने क्यूँ खुद ही से हार रहा हूँ!
कोशिशों का सिलसिला वही है जिंदगी में,
जाने क्यूँ खुद में कमियाँ तलाश रहा हूँ!
आशाओं के बीच होकर आज,
जाने क्यूँ निराशा में डूब रहा हूँ!
जल रहा हूँ हर रोज़ जिंदगी में,
फिर क्यूँ आज बुझा सा हूँ!
-- धीर (धीरेन्द्र)..,
जाने क्यूँ आज बुझा सा हूँ!
ख्वाहिशों के शहर में होकर आज,
क्यूँ खुद को अधूरा सा लग रहा हूँ!
जीत रहा हूँ हर ग़म ज़िंदगी के,
जाने क्यूँ खुद ही से हार रहा हूँ!
कोशिशों का सिलसिला वही है जिंदगी में,
जाने क्यूँ खुद में कमियाँ तलाश रहा हूँ!
आशाओं के बीच होकर आज,
जाने क्यूँ निराशा में डूब रहा हूँ!
जल रहा हूँ हर रोज़ जिंदगी में,
फिर क्यूँ आज बुझा सा हूँ!
-- धीर (धीरेन्द्र)..,
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