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Tuesday, 30 May 2017

आज और कल

यही सोच कर आज को लिखता हूँ,
काश कोई खुद को पढ़ पाए!

क्यूँ आज की तुलना कल से करें,
क्यों ना आज को आज में ही रहने दिया जाए!

कल उनका है,
जो आज की कदर जानते हैं!

दौर उन्ही का है जहाँ में,
जो मुश्किलों में जिंदगी को तराशते हैं!

जी लिए दूसरों में जिंदगी अब तक,
क्यूँ ना आज खुद में खुद को जी जिया जाए!

यही सोच कर आज को लिखता हूँ,
काश कोई खुद को पढ़ पाए!
-- धीर (धीरेन्द्र)...,



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