Friday, 23 June 2017
Thursday, 22 June 2017
पहचान
पहचान भी अपने आप में बड़ी बात है,
अगर लोगों के बीच बढ़ानी हो,
तो खुद में खोना पड़ता है!
-- धीर (धीरेन्द्र)...,
अगर लोगों के बीच बढ़ानी हो,
तो खुद में खोना पड़ता है!
-- धीर (धीरेन्द्र)...,
Tuesday, 20 June 2017
Monday, 19 June 2017
Sunday, 18 June 2017
Saturday, 17 June 2017
Friday, 16 June 2017
तजुर्बा
इंसान पूरी ज़िन्दगी गलत हो सकता है,
पर तजुर्बा अक्सर ज़िन्दगी में सही होता है.!
-- धीर (धीरेन्द्र) ..,Thursday, 15 June 2017
झिझक इंसान को अंदर से खोखली करती हैं,
ये आम बात है आज हर कोई एक अच्छी जिंदगी और अपने बेहतर भविष्य के बारे में सोचता है, कुछ सोचते ही रहते हैं और कुछ सोच को पूरा भी करते हैं| कुछ लोगों की सोच बड़ी होते हुये भी, लोग फिर भी पीछे रह जाते हैं, और किस्मत को दोष देते हैं|
एक बात आज प्राय सामने आती है, "झिझक" जो हमारे अंदर बसी है| कुछ लोगों के दिमाग़ में झिझक का प्रतिबिंब बना होता है, जिससे वह लोगों के बीच जाने में खुद को कमजोर समझते हैं, उनके मन में यही सोच अपना प्रभाव बनाती है, भीड़ में कैसे और लोगों में क्या बातें मुख्य होती हैं| यही से डर शुरू होता है, जो हमारे दिल को अंदर से कमजोर कर सीधा हमारे दिमाग़ पर असर करता है, जिससे कभी-कभार सब कुछ सही होने पर भी हम अपने लक्ष्य हासिल करते करते रह जाते हैं|
जब सोच हम पर प्रबल होती है, तभी कुछ लोग अपने लक्ष्य को हासिल करते हैं, और कुछ रह जाते हैं| इसका मुख्य कारण सोच है, सोच की दिशा अगर सही है, तो हम अपने उद्देश्य को आसानी से हासिल करने में सफल होते हैं , किंतु जब सोच दिशा सही नही होती है ,तब सिवाय मायूसी कुछ हाथ नही आता|
जिंदगी में कोई मुकाम हासिल करना है तो, सबसे पहले दिमाग़ का संतुलित में होना आवश्यक है, अन्यथा हर संभव कार्य हमारे लिए असंभव भी है|
किसी चीज़ को सोच का हिस्सा उतना ही बनाए
जितना वह हमारे लिए उपयोगी हो..!!
-- धीर (धीरेन्द्र) .....,
Wednesday, 14 June 2017
Tuesday, 13 June 2017
Monday, 12 June 2017
Thursday, 8 June 2017
Wednesday, 7 June 2017
ऐ दिल
ना कर एहसास लम्हों को,
ऐ दिल!
अब डरने लगा हूँ,
हर नये एहसास से!
ना ज़िक्र किया कर
लोगों में रह कर,
अब तुझ में खोकर
खुद को तलाशता हूँ!
ना जीत हर शख्स को
खुद से बेहतर,
जीत कर भी अब
खुद से हारता हूँ!
थम जा ज़रा,
ऐ दिल,
थम ने से तेरे एक पल
मानो! जिंदगी को सुकून सा मिलता है!
तोड़ कर चला जाता है,
हर शख्स,
मैं खुद में रह जाता हूँ
तुझ को जोड़ कर!
ना कर एहसास हर लम्हे को,
ऐ दिल!
अब डरने लगा हूँ,
हर नये एहसास से!
-- धीर (धीरेन्द्र)...,
ऐ दिल!
अब डरने लगा हूँ,
हर नये एहसास से!
ना ज़िक्र किया कर
लोगों में रह कर,
अब तुझ में खोकर
खुद को तलाशता हूँ!
ना जीत हर शख्स को
खुद से बेहतर,
जीत कर भी अब
खुद से हारता हूँ!
थम जा ज़रा,
ऐ दिल,
थम ने से तेरे एक पल
मानो! जिंदगी को सुकून सा मिलता है!
तोड़ कर चला जाता है,
हर शख्स,
मैं खुद में रह जाता हूँ
तुझ को जोड़ कर!
ना कर एहसास हर लम्हे को,
ऐ दिल!
अब डरने लगा हूँ,
हर नये एहसास से!
-- धीर (धीरेन्द्र)...,
Tuesday, 6 June 2017
Sunday, 4 June 2017
Saturday, 3 June 2017
Friday, 2 June 2017
Thursday, 1 June 2017
Wednesday, 31 May 2017
बेहतर कल
गर दर्द ही जिंदगी है,
तो घाव को क्या देखना!
गर राह काँटों से भरी है,
तो पैरों में क्या देखना!
अगर धूप जिंदगी में खिली हो,
तो छाँव की क्या सोचना!
गर लक्ष्य खुद को ही पाना है,
तो सफ़र में, किसी का साथ क्या सोचना!
जैसा आज है मुसाफिर,
उससे बेहतर कल को सोचना!
गर दर्द ही जिंदगी है,
तो घाव को क्या देखना!
-- धीर (धीरेन्द्र)...,
तो घाव को क्या देखना!
गर राह काँटों से भरी है,
तो पैरों में क्या देखना!
अगर धूप जिंदगी में खिली हो,
तो छाँव की क्या सोचना!
गर लक्ष्य खुद को ही पाना है,
तो सफ़र में, किसी का साथ क्या सोचना!
जैसा आज है मुसाफिर,
उससे बेहतर कल को सोचना!
गर दर्द ही जिंदगी है,
तो घाव को क्या देखना!
-- धीर (धीरेन्द्र)...,
Tuesday, 30 May 2017
आज और कल
यही सोच कर आज को लिखता हूँ,
काश कोई खुद को पढ़ पाए!
क्यूँ आज की तुलना कल से करें,
क्यों ना आज को आज में ही रहने दिया जाए!
कल उनका है,
जो आज की कदर जानते हैं!
दौर उन्ही का है जहाँ में,
जो मुश्किलों में जिंदगी को तराशते हैं!
जी लिए दूसरों में जिंदगी अब तक,
क्यूँ ना आज खुद में खुद को जी जिया जाए!
यही सोच कर आज को लिखता हूँ,
काश कोई खुद को पढ़ पाए!
-- धीर (धीरेन्द्र)...,
काश कोई खुद को पढ़ पाए!
क्यूँ आज की तुलना कल से करें,
क्यों ना आज को आज में ही रहने दिया जाए!
कल उनका है,
जो आज की कदर जानते हैं!
दौर उन्ही का है जहाँ में,
जो मुश्किलों में जिंदगी को तराशते हैं!
जी लिए दूसरों में जिंदगी अब तक,
क्यूँ ना आज खुद में खुद को जी जिया जाए!
यही सोच कर आज को लिखता हूँ,
काश कोई खुद को पढ़ पाए!
-- धीर (धीरेन्द्र)...,
Friday, 26 May 2017
Thursday, 25 May 2017
दस्तूर जिंदगी का
चुनौतियां कैसी भी हो,
उनको दस्तूर जिंदगी का समझ के स्वीकार लें!
नकारने वाले लोगों को,
समाज ज्यादा समय तक नहीं स्वीकारता!
जब तक आप में क्षमता है,
कोशिश तब तक करें!
कोशिश को देखकर
क्षमता अपने आप बढ़ने लगती है!
अनुभव एक मुसाफिर की तरह है,
जो जिंदगी भर हमारे साथ चलता है!
अगर मुश्किलों से हार भी गये आप,
पर खुद से कभी नही हारना!
खुद को जीतने वाला ही,
एक दिन दुनिया को जीतता है!
© धीर (धीरेन्द्र)..,
उनको दस्तूर जिंदगी का समझ के स्वीकार लें!
समाज ज्यादा समय तक नहीं स्वीकारता!
जब तक आप में क्षमता है,
कोशिश तब तक करें!
कोशिश को देखकर
क्षमता अपने आप बढ़ने लगती है!
सिर्फ़ जीत को लक्ष्य रखना ही जिंदगी नही है!
हार को स्वीकारना भी एक गुण है!
हार इतना सिखाती है जिंदगी में,
उतना जीत की चाह रखने वाले नही सीख पाते हैं!
जो जिंदगी भर हमारे साथ चलता है!
अगर मुश्किलों से हार भी गये आप,
पर खुद से कभी नही हारना!
एक दिन दुनिया को जीतता है!
© धीर (धीरेन्द्र)..,
Wednesday, 24 May 2017
Tuesday, 23 May 2017
नाम मोहब्बत में
कोई अब बदनाम कर लो हमें,
मोहब्बत में हमने बहुत नाम कमा लिया!
अब तो आकर थाम लो हमें,
तोड़ कर खुद को, तुझ से जोड़ लिया!
करीब से आकर अब जान लो हमें,
बरसों से दिलों ने दूरी को जिंदगी का दस्तूर ही मान लिया!
इस तन्हा को हमसफ़र बना के देख लो,
मुझे तो जिंदगी ने तन्हा मुसाफिर ही जान लिया!
कोई अब बदनाम कर लो हमें,
मोहब्बत में हमने बहुत नाम कमा लिया!
-- धीर (धीरेन्द्र)..,
मोहब्बत में हमने बहुत नाम कमा लिया!
अब तो आकर थाम लो हमें,
तोड़ कर खुद को, तुझ से जोड़ लिया!
करीब से आकर अब जान लो हमें,
बरसों से दिलों ने दूरी को जिंदगी का दस्तूर ही मान लिया!
इस तन्हा को हमसफ़र बना के देख लो,
मुझे तो जिंदगी ने तन्हा मुसाफिर ही जान लिया!
कोई अब बदनाम कर लो हमें,
मोहब्बत में हमने बहुत नाम कमा लिया!
-- धीर (धीरेन्द्र)..,
Monday, 22 May 2017
Saturday, 20 May 2017
Thursday, 18 May 2017
शायद
भिगो ले खुद को बारिश में आज,
शायद, जिंदगी के पन्नों की स्याही धूल जाए!
लिख ले फिर से खुद को आज,
शायद, कोई भुला बिसरा याद आए!
आजमा ले हुनर जिंदगी का मुसाफिर,
शायद, ये वक्त दो बार, ना आये!
मिटा ले दिलों की दूरियाँ अभी भी,
शायद, कोई रोज़ वो तुझ से बिछड़ जाये!
तराश ले खुद को आज में,
शायद, कल तुझे समझ पाए!
मिटा ले, गुमान दिल से,
शायद, कल तेरे और करीब आए!
जी ले जिंदगी आज में,
शायद, ये आज फिर ना आए!
भिगो ले खुद को बारिश में आज,
शायद, जिंदगी के पन्नों की स्याही धूल जाए!
-- धीर (धीरेन्द्र)...,
शायद, जिंदगी के पन्नों की स्याही धूल जाए!
लिख ले फिर से खुद को आज,
शायद, कोई भुला बिसरा याद आए!
आजमा ले हुनर जिंदगी का मुसाफिर,
शायद, ये वक्त दो बार, ना आये!
मिटा ले दिलों की दूरियाँ अभी भी,
शायद, कोई रोज़ वो तुझ से बिछड़ जाये!
तराश ले खुद को आज में,
शायद, कल तुझे समझ पाए!
मिटा ले, गुमान दिल से,
शायद, कल तेरे और करीब आए!
जी ले जिंदगी आज में,
शायद, ये आज फिर ना आए!
भिगो ले खुद को बारिश में आज,
शायद, जिंदगी के पन्नों की स्याही धूल जाए!
-- धीर (धीरेन्द्र)...,
Wednesday, 17 May 2017
खुद के करीब जिंदगी में
बदल जाती है अक्सर पल में जिंदगी,
गर हर पल खुद के करीब रहो तो!
मिट जाते हैं अक्सर फासले,
गर आप अपनी सोच के करीब रहो तो!
गम भी बहार ले आते हैं,
गर आप जिंदगी में खुश रहो तो!
मुश्किलें आसान हो जाती हैं,
अगर आप तरीके बदल लो जिंदगी में!
सफ़र भी कट जाता है अक्सर,
गर सपनों को हम सफ़र बना लो जिंदगी में!
बदल जाती है अक्सर पल में जिंदगी,
गर हर पल खुद के करीब रहो तो!
-- धीर (धीरेन्द्र)..,
गर हर पल खुद के करीब रहो तो!
मिट जाते हैं अक्सर फासले,
गर आप अपनी सोच के करीब रहो तो!
गम भी बहार ले आते हैं,
गर आप जिंदगी में खुश रहो तो!
मुश्किलें आसान हो जाती हैं,
अगर आप तरीके बदल लो जिंदगी में!
सफ़र भी कट जाता है अक्सर,
गर सपनों को हम सफ़र बना लो जिंदगी में!
बदल जाती है अक्सर पल में जिंदगी,
गर हर पल खुद के करीब रहो तो!
-- धीर (धीरेन्द्र)..,
Monday, 15 May 2017
Sunday, 14 May 2017
Saturday, 13 May 2017
मोहब्बत खुद से होने लगी
कला खूब है तुम में कमियाँ तराश ने की,
हमे भी अब अच्छाइयों से नफ़रत सी होने लगी है!
तन्हा है जिंदगी इस कदर,
लोगों के साथ से कम तन्हाई से ज़्यादा मोहब्बत होने लगी है!
सोच उँची है जिंदगी में मेरी,
मगर मोहब्बत जिंदगी की गहराइयों से होने लगी है!
खामियाँ आज भी बहुत हैं मुझ में,
फिर भी आज खुद से मोहब्बत होने लगी है!
कला खूब है तुम में कमियाँ तराश ने की,
हमे भी अब अच्छाइयों से नफ़रत सी होने लगी है!
-- धीर (धीरेन्द्र)...,
हमे भी अब अच्छाइयों से नफ़रत सी होने लगी है!
तन्हा है जिंदगी इस कदर,
लोगों के साथ से कम तन्हाई से ज़्यादा मोहब्बत होने लगी है!
सोच उँची है जिंदगी में मेरी,
मगर मोहब्बत जिंदगी की गहराइयों से होने लगी है!
खामियाँ आज भी बहुत हैं मुझ में,
फिर भी आज खुद से मोहब्बत होने लगी है!
कला खूब है तुम में कमियाँ तराश ने की,
हमे भी अब अच्छाइयों से नफ़रत सी होने लगी है!
-- धीर (धीरेन्द्र)...,
Friday, 12 May 2017
Thursday, 11 May 2017
Wednesday, 10 May 2017
आज
आज दीवार दिल की रंग दूँ ,
मन रंगों से खिल रहा है।
आज दूरियाँ दिल से मिटा दूँ,
मन मीलों तय कर रहा है।
आज हर ख्वाब को अपना बना लूँ,
मन दिल में हसीन पल संजो रहा है।
आज दिल को शायर बना लूँ,
मन खुद को गजल सा गुनगुना रहा है।
आज ख्वाहिशों से दिल सजा लूँ,
मन खुशी से झूम रहा है।
आज दीवार दिल की रंग दूँ ,
मन रंगों खिल रहा है।
-- धीर (धीरेन्द्र)..,
मन रंगों से खिल रहा है।
आज दूरियाँ दिल से मिटा दूँ,
मन मीलों तय कर रहा है।
आज हर ख्वाब को अपना बना लूँ,
मन दिल में हसीन पल संजो रहा है।
आज दिल को शायर बना लूँ,
मन खुद को गजल सा गुनगुना रहा है।
आज ख्वाहिशों से दिल सजा लूँ,
मन खुशी से झूम रहा है।
आज दीवार दिल की रंग दूँ ,
मन रंगों खिल रहा है।
-- धीर (धीरेन्द्र)..,
Monday, 8 May 2017
दिखावा जीवन
अगर जिंदगी में दिखावा ही जीवन होता,
तो जिंदगी जीने के लिए किसी मिसाल की जरूरत नही होती।
-- धीर (धीरेन्द्र)
तो जिंदगी जीने के लिए किसी मिसाल की जरूरत नही होती।
-- धीर (धीरेन्द्र)
Sunday, 7 May 2017
जिंदगी
दिल से समझ ले गर कोई दर्द किसी का,
घाव भी दर्द भूलकर जिंदगी जीने लगता है!
एक पल ग़म को भूल कर जी ले कोई,
जिंदगी का हर लम्हा हसीन लगने लगता है!
मुश्किलों से गर सबक ले कोई,
हार का अनुभव भी जीत से बढ़ कर लगने लगता है!
ख्वाहिशों को गर दिल में पनाह दे कोई,
तो मन भी दिल के साथ उसी की बात सुनने लगता है!
कोशिश तो करके देखो जिंदगी में,
मुसाफिर भी एक दिन मंज़िल की राह खुद से बनने लगता है!
आज में ज़रा कल को भी जी कर देखो,
जिंदगी का हर पल और भी हंसमुख सा लगने लगता है!
दिल से समझ ले गर कोई दर्द किसी का,
घाव भी दर्द भूलकर जिंदगी जीने लगता है!
-- धीर (धीरेन्द्र)..,
घाव भी दर्द भूलकर जिंदगी जीने लगता है!
एक पल ग़म को भूल कर जी ले कोई,
जिंदगी का हर लम्हा हसीन लगने लगता है!
मुश्किलों से गर सबक ले कोई,
हार का अनुभव भी जीत से बढ़ कर लगने लगता है!
ख्वाहिशों को गर दिल में पनाह दे कोई,
तो मन भी दिल के साथ उसी की बात सुनने लगता है!
कोशिश तो करके देखो जिंदगी में,
मुसाफिर भी एक दिन मंज़िल की राह खुद से बनने लगता है!
आज में ज़रा कल को भी जी कर देखो,
जिंदगी का हर पल और भी हंसमुख सा लगने लगता है!
दिल से समझ ले गर कोई दर्द किसी का,
घाव भी दर्द भूलकर जिंदगी जीने लगता है!
-- धीर (धीरेन्द्र)..,
Saturday, 6 May 2017
काश
काश हमे जानने वालों ने,
कभी एक पल के लिए खुद को पहचाना होता।
नफ़रत से ज़्यादा प्यार को आजमाने वालों ने,
कभी मोहब्बत को जिंदगी का तोहफ़ा माना होता।
खुशी की चाह रखने वाले हर शख्स ने,
काश ग़म को जिंदगी का दस्तूर माना होता।
ज़िक्र मुश्किलों का छोड़ कर,
लोगों ने ज़िंदगी को ज़िंदगी से जाना होता।
काश हमे जानने वालों ने,
कभी एक पल के लिए खुद को पहचाना होता।
-- धीर (धीरेन्द्र)..,
कभी एक पल के लिए खुद को पहचाना होता।
नफ़रत से ज़्यादा प्यार को आजमाने वालों ने,
कभी मोहब्बत को जिंदगी का तोहफ़ा माना होता।
खुशी की चाह रखने वाले हर शख्स ने,
काश ग़म को जिंदगी का दस्तूर माना होता।
ज़िक्र मुश्किलों का छोड़ कर,
लोगों ने ज़िंदगी को ज़िंदगी से जाना होता।
काश हमे जानने वालों ने,
कभी एक पल के लिए खुद को पहचाना होता।
-- धीर (धीरेन्द्र)..,
Friday, 5 May 2017
ख़्वाहिश और एहसास
ख़्वाहिश और एहसास जिंदगी के दो अहम हिस्से हैं!
जब ख्वाहिशों की लहर मन मे उमड़ ने लगती है,
तब जिंदगी की हर मुश्किल
और भी आसान सी लगने लगती है!
जब लहरें उमड़ के ज़िंदगी के करीब आती हैं,
तब जिंदगी मे एहसास का सिलसिला शुरू होता है!
कभी कुछ खो कर कुछ पाने का,
तो कभी सब कुछ पाकर कुछ खो जाने का एहसास!
ख़्वाहिश ज़रूरी है जिंदगी मे,
ये इंसान को खुद से जीने का एहसास कराती है!
-- धीर (धीरेन्द्र)..,
जब ख्वाहिशों की लहर मन मे उमड़ ने लगती है,
तब जिंदगी की हर मुश्किल
और भी आसान सी लगने लगती है!
जब लहरें उमड़ के ज़िंदगी के करीब आती हैं,
तब जिंदगी मे एहसास का सिलसिला शुरू होता है!
कभी कुछ खो कर कुछ पाने का,
तो कभी सब कुछ पाकर कुछ खो जाने का एहसास!
ख़्वाहिश ज़रूरी है जिंदगी मे,
ये इंसान को खुद से जीने का एहसास कराती है!
-- धीर (धीरेन्द्र)..,
Thursday, 4 May 2017
जाने क्यूँ
जल रहा हूँ हर रोज़ जिंदगी में,
जाने क्यूँ आज बुझा सा हूँ!
ख्वाहिशों के शहर में होकर आज,
क्यूँ खुद को अधूरा सा लग रहा हूँ!
जीत रहा हूँ हर ग़म ज़िंदगी के,
जाने क्यूँ खुद ही से हार रहा हूँ!
कोशिशों का सिलसिला वही है जिंदगी में,
जाने क्यूँ खुद में कमियाँ तलाश रहा हूँ!
आशाओं के बीच होकर आज,
जाने क्यूँ निराशा में डूब रहा हूँ!
जल रहा हूँ हर रोज़ जिंदगी में,
फिर क्यूँ आज बुझा सा हूँ!
-- धीर (धीरेन्द्र)..,
जाने क्यूँ आज बुझा सा हूँ!
ख्वाहिशों के शहर में होकर आज,
क्यूँ खुद को अधूरा सा लग रहा हूँ!
जीत रहा हूँ हर ग़म ज़िंदगी के,
जाने क्यूँ खुद ही से हार रहा हूँ!
कोशिशों का सिलसिला वही है जिंदगी में,
जाने क्यूँ खुद में कमियाँ तलाश रहा हूँ!
आशाओं के बीच होकर आज,
जाने क्यूँ निराशा में डूब रहा हूँ!
जल रहा हूँ हर रोज़ जिंदगी में,
फिर क्यूँ आज बुझा सा हूँ!
-- धीर (धीरेन्द्र)..,
Wednesday, 3 May 2017
हमसफ़र
जिया जिंदगी तुझे अब तक ,
खुद से खुद में तराश कर!
नाराज़ नही था तुझसे मैं,
बस अब तलक ये दिल ही नादान था!
रूठा हूँ तुझसे अक्सर,
तुझे अपना मानकर!
जीना सिखाया, हर सफ़र में तूने,
हमसफ़र मुझे अपना मान कर!
तन्हाई ने तन्हा बनाया,
अक्सर मुझे पराया जान कर!
तूने (जिंदगी) आगोश में लिया,
मुझे अक्सर अपना मान कर!
जिया जिंदगी तुझे अब तक ,
खुद से खुद में तराश कर!
-- धीर (धीरेन्द्र)
खुद से खुद में तराश कर!
नाराज़ नही था तुझसे मैं,
बस अब तलक ये दिल ही नादान था!
रूठा हूँ तुझसे अक्सर,
तुझे अपना मानकर!
जीना सिखाया, हर सफ़र में तूने,
हमसफ़र मुझे अपना मान कर!
तन्हाई ने तन्हा बनाया,
अक्सर मुझे पराया जान कर!
तूने (जिंदगी) आगोश में लिया,
मुझे अक्सर अपना मान कर!
जिया जिंदगी तुझे अब तक ,
खुद से खुद में तराश कर!
-- धीर (धीरेन्द्र)
Tuesday, 2 May 2017
"एक सवाल खुशी से"
ग़म के जाने के बाद,
मैने खुशी से पूछा,
"तू पूरी जिंदगी मेरे साथ क्यूँ नही बीता सकती"?
खुशी मुस्कुरा कर बोली,
"जब तू एक जोड़ी कपड़ों में एक दिन नई गुज़ार सकता,
भला मैं तेरे संग कैसे सारी जिंदगी बीता सकती हूँ"!
-- - धीर (धीरेन्द्र)..,
मैने खुशी से पूछा,
"तू पूरी जिंदगी मेरे साथ क्यूँ नही बीता सकती"?
खुशी मुस्कुरा कर बोली,
"जब तू एक जोड़ी कपड़ों में एक दिन नई गुज़ार सकता,
भला मैं तेरे संग कैसे सारी जिंदगी बीता सकती हूँ"!
-- - धीर (धीरेन्द्र)..,
एक कोशिश
जो उम्मीद अब आस ना रही हो,
उसे ग़म क्यूँ बनने दिया जाय!
गर मुसाफिर बनना है मंज़िल का,
क्यूँ ना परवाह किए बिना, मंज़िल तय की जाय!
जो दिन ढल गया जिंदगी में,
क्यूँ आज को उसमें जिया जाय!
डर को कमी बता कर,
क्यूँ समझौते जिंदगी से किए जाय!
हार को सबक बना कर,
क्यूँ ना लक्ष्य को आंक लिया जाय!
सोच में डूब ने से बेहतर,
आज एक और कोशिश की जाय!
हार कर अक्सर टूटते हैं लोग,
क्यूँ ना आज खुद को जोड़ लिया जाय!
जो उम्मीद अब आस ना रही हो,
उसे ग़म क्यूँ बनने दिया जाय!
-- धीर (धीरेन्द्र)..,
उसे ग़म क्यूँ बनने दिया जाय!
गर मुसाफिर बनना है मंज़िल का,
क्यूँ ना परवाह किए बिना, मंज़िल तय की जाय!
जो दिन ढल गया जिंदगी में,
क्यूँ आज को उसमें जिया जाय!
डर को कमी बता कर,
क्यूँ समझौते जिंदगी से किए जाय!
हार को सबक बना कर,
क्यूँ ना लक्ष्य को आंक लिया जाय!
सोच में डूब ने से बेहतर,
आज एक और कोशिश की जाय!
हार कर अक्सर टूटते हैं लोग,
क्यूँ ना आज खुद को जोड़ लिया जाय!
जो उम्मीद अब आस ना रही हो,
उसे ग़म क्यूँ बनने दिया जाय!
-- धीर (धीरेन्द्र)..,
Monday, 1 May 2017
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