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Tuesday, 17 November 2015

"शब्दों के बीज"

पुरानी कहावतों में सच्चाई
और गहराई नजर आती है।
फिर क्यों आधुनिक लोगों की बातों में
केवल चतुराई नजर आती है।

नाम के लिए जीया करते थे वो लोग।
फिर क्यों नाम डुबाने के लिए जी रहे हैं,
आधुनिक युग के कुछ लोग।
हर सुख दुःख में संयम और सुकून था उन्हें।
पर आज दुःख में संयम खो कर,
सुख में क्यों इतराते है लोग।

आपस में सदभावना का पाठ पढ़ा कर,
लोगों को एक बन्धन में
लाना चाहते थे वो लोग।
फिर क्यों आज आपस में
दुर्व्यवहार कर,
लोगों में फूट दिलाते हैं कुछ लोग।

शब्दों की बोली से
फूल बरसाते थे वो लोग।
फिर क्यों आज शब्दों के बोल से
लोगों के मन को आहत पहुँचाते हैं कुछ लोग।

जीवन में अच्छी प्रेरणा देकर,
मन में आशा के बीज बोते थे वो लोग।
फिर क्यों आज जातिवाद की भावना जगा कर,
आपस में नफरत के बीज बोते हैं कुछ लोग।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

"मन के गीत"

मन के गीत में
यूँ ही गुनगुनाता चला।
कोशिश के दीप मंजिल की
राहों में जलाता चला।

मन में आशा की
एक नई दुनिया बसाता चला।
मंजिल को पाने की लगन में,
यूँ मदमस्त चलता चला।
मानों मन की आशा को
पूरा करने का जुनून सा खिला।

कठिनाइयों ने रोका,
मुश्किलों ने टोका।
पर खुद को ना रोका,
बढ़ता चला।
मन के गीत में
यूँ ही गुनगुनाता चला।
मन में लगन की ज्योत
जलाता चला।
उम्मीद की किरण
अपने अंदर बसाता चला।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

"मतलब की ये दुनिया"

मतलब की ये दुनिया।
मतलब के लोग यहाँ।
मतलब का है याराना।
चलना जरा संभलकर यहाँ।

अगर पाना है कुछ यहाँ,
तो मेहनत के गुर आजमाना।

बढ़ता है वही यहाँ,
जो लोगों को जानता है यहाँ।
पिछड़ता है, वो यहाँ,
जो अपनों पर कम, गैर पर ज्यादा
भरोसा करना जनता है यहाँ।
मतलबी लोग मतलबी दुनिया।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट
13.07.2015

"औलाद"

ऐसा भी क्या बड़ा होना।
जो सपनो को पूरा कर,
माँ बाप से दूर होना।
ऐ इंसान पाकर भी
तूने सब खो दिया।

सोचा न था कि किस्मत,
उनको ये दिन दिखायेगी।
उनके ही बेटे,
उनको आज दर
दर की ठोकरें खिलायेंगे।

ये आशा न थी,
उनके मन में।
जिन बेटों की परवरिश
स्वयं दुःख पाकर सुख से की।
आज वही बेटे माँ बाप को क्यों भूल गये।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

"सीखो तुम सभी से"

सीखो तुम सभी से,
पर कोशिश स्वयं करना।
जीवन में दूसरों के भरोसे बैठकर,
स्वयं को बेकार ना करना।

अपनों का प्यार,
आशीर्वाद लेकर ही आगे बढ़ना।
लगेगी आसान हर मुश्किल डगर।
पर कोशिश तुम स्वयं करना।

आसान नहीं मंजिल
पर कोशिश स्वयं करना
कठिनाइयां बहुत है
मंजिल की राहो में,
पर कोशिश स्वयं करना।
 
गिरकर तुम स्वयं उठना।
सहारा तुम भले ही बनना,
पर दूसरों का सहारा ना लेना।
गिरकर उठना,
पर उठकर नहीं गिरना।
सीखो तुम सबसे,
पर कोशिश स्वयं करना।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

"भूल ना कर"

इस बात की तू भूल ना कर।
लोगों से अपना उल्लू सीधा ना कर।
कोई ना जाने वक़्त के हेर।
कब मिला दे उसी से फेर।

दुनिया ये गोल है।
बस प्यार भरे दो बोल हैं।
किस भृम में तू डूबा है।
जो बीज आचरण के
लोगों में तू बोएगा।

उसी के फल तू पायेगा।
वक़्त का तुझे अहसास नहीं।
इस बात की तू भूल ना कर।
लोगों से अपना वैर ना कर।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

"नारी समाज का दर्पण"

नारी समाज का दर्पण है।
हम सब इस पर अर्पण हैं।
भू से लेकर नभ तक,
कोई जगह अछुई नहीं।
 
हर जहाँ पे नारी ने आज,
अपनी जीत का परचम लहराया है।
इस युग को एक नई राह पे,
नारी ने चलना सीखाया है।
 
इस मंजिल को पाने में,
कई मशकत, कठिनायों में,
नारी को संघर्ष करना पड़ा।
नारी समाज की आशा है।
जीवन जीने की परिभाषा है।

 नारी समाज का दर्पण है।
 हम सब इस पर अर्पण हैं।
नारी सृजन एवं सबलता का अहसास है।
नारी श्रद्धा और दया वाश है।
अबला नहीं आज ये सशक्त है।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

"मन की लालसा"

मन की लालसा ने मुझे पुकारा।
छू ले गगन, बन एक तारा।
रोशन कर दे इस जग को तू।
बन सबकी उम्मीदों का सितारा।

अरमान तो दिल में बहुत हैं, तेरे।
पर ये है मंजिल का नया इशारा।
मन की लालसा ने मुझे पुकारा।
बन जगत का तारा।

हार मान ना होना तू।
बनना है तुझे, सबका सहारा।
किया सफर, जो राहों में तू ने।
वो मंजिल की डगर अब दूर नहीं।
जलाता जा यूँ दीपक आशाओं के मन में।
मंजिल से अब तू दूर नहीं।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

"नशा नाश है"

नशा जीवन का नाश है।
समाज का विनाश है।
नशा उन्नति में बाधा है।
समाज में इसकी पकड़ ज्यादा है।

उजाड़ा नशे ने घरों को।
बिगाड़ा नशे ने मासूमो को।
कितनों को बेघर किया।
युवाओं को बर्बाद किया।

नशा जीवन का नाश है।
समाज का विनाश है।
आओ मिलकर प्रण लें।
मन में दृण संकल्प लें।
नशा मुक्ति अभियान चलायें,
देश को आगे बढ़ाये।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

"बेटी एक वरदान"

बेटी एक वरदान है।
समाज का कल्याण है।
बेटी एक आस है,
देवी का वास है।

बेटी ही वृद्धि है,
धन और समृद्धि है।
भ्रूण हत्या पाप है,
समाज का अभिसाप है।

आओ मिलकर हाथ बढ़ाये,
बेटी बचाओ,
अभियान चलाये।
समाज में बेटी को सम्मान दिलाये।
बेटी एक वरदान है।

उन पापियों का नाश करें,
समाज से पर्दाफ़ाश करें।
बेटी एक वरदान है,
समाज का कल्याण है।

बेटी एक गौरव है।
समाज का सौरभ है।
बेटी हो तो सब सुख चैना,
बिन बेटी के जग है सुना।
बेटी एक वरदान है।
समाज का कल्याण है।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

"मैने सीखा"



फूलों से मैने हँसना सीखा।
नन्हे पेड़ों से आगे बढ़ना सीखा।
खेतों से मेहनत करना सीखा।
फसलों से गर्व करना सीखा।
फूलों से मैने हँसना सीखा।

पापा से परिश्रम करना सीखा।
माँ से प्यार करना सीखा।
लोगों से आगे बढ़ना सीखा।
फूलों से मैने हँसना सीखा।

पुस्तक से मार्गदर्शक बनना सीखा।
अध्यापक से ज्ञान बटना सीखा।
मित्रों से मिलकर रहना सीखा।
फूलों से मैने हँसना सीखा।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

"इंसान''

हे इंसान, है क्यों,
तू इतना परेशान।
सुख में भी
और दुख में भी।
आखिर क्या है,
तेरे अरमान।
दूसरा सुखी है
पर क्यों तू दुखी है।
दूसरा दुखी है,
पर क्यों तू सुखी है।

हे इंसान, है क्यों,
तू इतना परेशान।
दूसरों पे भेद भाव
क्यों करता है।
आखिर हम सब हैं
कुदरत की सन्तान।
क्या पाया, क्या खोया,
उसका तुझे गम नहीं।

खुद तू कुछ कर नहीं पाया।
जो मेहनत करे,
वो तुझको नहीं भाया।
अपनों को गिरा कर,
खुद को आगे बड़ा कर।
किया तूने अपमान।
हे इंसान,
क्या है तेरे अरमान।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

"हिन्दी भाषा''

मेरी आशा, हिन्दी भाषा।
जिसने बदली है,
मेरे जीवन की परिभाषा।
मिला मुझे वो ज्ञान,
बनी नई पहचान इससे।
मन में है नई जिज्ञासा।
मेरी आशा, हिन्दी भाषा।

पाया है मैने, पाउँगा इससे।
छाया हूँ मै, छा जाऊँगा इससे।
लिखा है मैने, लिखूँगा इसे।
बढ़ा हूँ मै, बढूंगा  इससे।
मेरी आशा, हिन्दी भाषा।

अपनाओ ये आशा, हिन्दी भाषा।
दोहराओ तुम भी,
आपस में हिन्दी भाषा।
बने ये सबकी आशा, हिन्दी भाषा।
प्रचार बड़े प्रसार बड़े,
पुरे देश में हिन्दी का संचार बड़े।
मेरी आशा, हिन्दी भाषा।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

"कुछ कहना चाहती है जिन्दगी''

कुछ कहना चाहती है जिन्दगी।
सपनो को पूरा कर,
एक नई मिसाल बनना चाहती
है जिन्दगी।
मंजिल का सफर तय कर,
जीवन में उपलब्धियां
हासिल करना चाहती है जिन्दगी।

कुछ कहना चाहती है जिन्दगी।
भीड़ को पीछे छोड़ कर,
आगे बढ़ना चाहती है जिन्दगी।
मंजिल की डगर मुश्किल है मगर,
चलना है सम्भलकर।
शायद ये बात बताना
चाहती है जिन्दगी।

अकसर हार कर,
बैठ जाता हूँ यूँ ही।
मन में सपनों की दुनिया
बनाता हूँ यूँ ही।
मेरी हार ही मेरी जीत तय करेगी।
इस बात को उम्मीद बनाकर।
जीवन के समुन्दर में
कोशिशों के गोते लगाता हूँ यूँ ही।

इन सब की चाह में
जिन्दगी कितना कुछ सिखाती है।
मंजिल को पाने की राह में
जिन्दगी कैसे
कैसे दिन दिखाती है।
घबरा के सबर पा लिया।
कुछ पाकर कुछ खो लिया।
कभी रो लिया कभी हँस लिया।
जिन्दगी ने जो प्यार से दिया,
उसको मैने कबूल किया।

खो कर पाना अच्छा लगता है।
पर किसी बात को भुलाकर
दोहराना बुरा लगता है।
जिन्दगी ये सब बताना चाहती है,
मुश्किलों को आसान बनाना चाहती है।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

"रोते हुये आया, रुलाकर जायेगा''

रोते हुये तू आया था,
और रुलाकर जायेगा।
कुछ पल नफरत से बिता लिये,
अब कुछ पल प्यार से निभा ले।
जिन्दगी का क्या है,
आज हँसा दे,
ना जाने कब रुला दे।
भ्रम को भुला कर,
हकीकत को अपना ले।

रोते हुये तू आया था,
और रुला कर जायेगा।
अपने लिये तो बहुत जी लिया,
अब नाम के लिये जी ले।
तारीफों के पुल से उतरकर,
जिन्दगी को हकीकत से जी ले।

रोते हुये तू आया था,
और रुला कर जायेगा।
चन्द पैसों पर अभिमान ना कर।
समय की बारिश में
मैल बनकर बह जायेगा पैसा।
जो बच भी गया
वो सब यही धरा रह जायेगा।
शोहरत प्यार की कमा ले
अपने साथ लेकर जायेगा।

रोते हुये तू आया था,
और रुला कर जायेगा।
अब तक जो किया,
उस भूल को भुला कर,
सभी को अपना कर,
हर दुःख में साथ निभा कर।
चलता चला चल।

जिस आज के गरूर में है तू
ये आज उस रेत की तरह है,
जो तेरी मुट्ठी से फिसल रही है।
खाली हाथ आया था,
और खाली हाथ जायेगा।
केवल तुझे सफेद चादर में
भेज दिया जायेगा।
रोते हुये तू आया था,
और रुला कर जायेगा।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

Friday, 13 November 2015

मतलबी दौर

मलतब के लोगों में
अजनबी सा खुद को
लगने लगा हूँ।
बदलते वक्त के दौर में
पाकर भी सब कुछ खोने लगा हूँ।
ऐसी सौहरत का भी क्या कहना,
जिनको पाकर खुद को
अपनों से दूर करना।
हर पलों को मैंने अपना बनाया।
आने वाले दौर के लिये,
उस वक्त को अपनी यादों में सजाया।
उम्मीद से ज्यादा जिसे
अपना समझने लगे,
पर बदलते दौर में वो
शब्दों के नये तीर चुभोने लगे।
तब से अब तक
वफा के नाम से ही
मैं डरने लगा हूँ।
मतलबी लोगों के नाम से,
मैं डर कर काँपने लगा हूँ।
अक्सर जरूरतों में जो,
अपनी फ़रियाद सुनाया करते थे।
पर बदलते वक्त के दौर में,
आज खुद को वक्त का
विधाता समझने लगे हैं।
हर पल को हमने अपनी
इबादत समझ कर सींचा।
वही पल आज
एक मतलबी दौर सा लगने लगा है।
मलतब के लोगों में
अजनबी सा खुद को
लगने लगा हूँ।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

बेटी एक चहल

बेटी एक चहल है,
बेटी एक पहल है।
बेटी ही आज है,
बेटी ही कल है।
बेटी आश है,
समाज का विकास है।
अगर ऐसी सोच
सभी की हो जाये।
हर घर को बेटी महकाए।
बेटी में कई रूप समाये।

बेटी एक पहल है,
हर दुविधा का हल है।
कभी माँ तो कभी बहन है,
कभी पत्नी तो कभी बहु,
बेटी समाज का आधार है।
बेटी करुणा और प्यार है।
बेटी समाज की डोर है,
हर पहलू की छोर है।

बेटी एक चहल है,
सृष्टि की रचना की पहल है।
बेटी नहीं तो जग नहीं।
आने वाला कोई युग नहीं।
बेटी ने किया उपकार मुझ पर।
कभी माँ बनकर जन्म दिया,
कभी बहन के रूप में,
बहन का प्यार दिया।
तो कभी पथिक बनकर,
जीवन के सफर में साथ दिया।
नमन् करूँ हर बेटी को मै।
जिसने स्वयं दुःख पाकर,
हम सभी को सुख दिया।

बेटी है तो जग है
हर राह है हर पग है।
आओ प्रण करें सब मिलकर,
बेटी का सम्मान बढ़ाएँ,
कुरीतियों को जड़ से मिटायें।
बेटी निर्मल है,
बेटी आज है,
बेटी कल है।
©धीरेन्द्र सिंह बिष्ट
28.09.2015

दहेज़ हमारे समाज का कोढ़

ना रीत है ना प्रीत है।
दहेज प्रथा समाज में चला रहे
कुछ लोगों की ये गलत नीत है।
कहावते तो अनेक हैं
पर उनमें से ये एक है।
बेटी का घर मायका नहीं ससुराल है।
फिर दहेज़ क्यों देना होता है?
जब बेटी का घर ससुराल होता है।

बुजदिल है वो पिता,
जो अपनी बेटी को बोझ समझता है।
लोभी है वो पिता,
जो अपने बेटे की आढ़ में दहेज़ लेता है।
क्यों आप दहेज़ का प्रलोभन देकर
किसी बेटे को कमजोर कर रहे हो।
क्यों तुम दहेज़ माँग कर
किसी बेटी को मजबूर कर रहे हो।

दहेज़ देना भी पाप है,
दहेज़ लेना भी पाप है।
दहेज़ दो घरो का जोड़ नहीं,
ये समाज का कोढ़ है।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट।

“गुमसुम मंजिल”

मंजिल क्यों आज
गुमसुम सी लगने लगी है।
हर कोशिश,
आज यूँ नाकाम सी
लगने लगी है।
अब और इम्तिहान ना ले,
मेरी तकदीर के ऐ मालिक।
मैं इतना भी मजबूत नहीं।
जो तेरी परख का इम्तिहान दे सकूँ।

मंजिल क्यों आज गुमसुम
सी लगने लगी है।
हर उम्मीद की किरण
क्यों आज ढलने लगी है।
कोशिश के साथ आज,
मैं आस लगाये खड़ा हूँ।
अपनी मंजिल की चाह में
उम्मीदों का दामन फैलाये खड़ा हूँ।
राह की मुश्किलों ने झिजोड़ा
हर कदम पे ठोकरों ने तोड़ा ,

मंजिल क्यों आज
गुमसुम सी लगने लगी है।
इन्तजार की घड़ी अब क्यों
बढ़ने लगी है।
अब और इन्तजार मुझे
भाता नहीं।
बीता हुआ समय कभी
लौट कर आता नहीं।
दुःखों का वो सफर,
सुख पाने की चाह में
भुला दिया हमने।

वक्त के आगे कमजोर से
यूँ पड़ने लगे हैं हम।
खुद को मनाते,
हर गम भुलाते
मन में हर आस जागाते
बढ़े हैं हम।
दुःख को सबक और
सुख को सीख समझकर
हर रीत निभाते चले हैं हम।
मंजिल क्यों आज गुमसुम सी लगने लगी है।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

शनिवार का दिन

कहानी का सारांश :
इस कहानी में केवल एक शनिवार के दिन का वर्णन किया है। कहानी में मुख्य भूमिका एक नन्हे बालक की है। बालक अपने बालपन के कारण अपनी पढ़ाई के प्रति थोड़ा लापरवाह है। किन्तु बालक के मन में पिता के प्रति उनकी आज्ञा का पालन और उनके अनुशासन का डर का वर्णन कहानी में किया है। दूसरी भूमिका पथ-प्रदर्शन के तौर पर बालक के पिता भानु प्रताप की है। भानु प्रताप अपने बेटे को बहुत प्रेम करते हैं, किन्तु वह अपने पुत्र को ज्यादा लाड़ नहीं लड़ाते, वह इस बात से भली भाँति परिचित है ज्यादा लाड़ लड़ाने से उनका बेटा बिगड़ सकता है। इसीलिये बेटे के प्रति मन में प्रेम की भावना और मुँख पर एक कड़ा अनुशासन की भूमिका निभाते हैं। जिससे उनका बेटा आगे चल कर एक अच्छे पथ पर अपनी पहचान कायम करता है।

        शनिवार का दिन है। हल्की सी शीत लहर बह रही है। आसमान साफ है पक्षी रोज की तरह अपने समूह में अपने भोजन की तलाश में निकल रहे हैं। मैं एक टक गर्दन ऊपर किये उनको देख रहा हूँ। और मुस्कुरा कर उनको देखता हूँ, यह बात सोच कर मन ही मन निराश भी हो रहा हूँ, ”रोज की तरह आज भी स्कूल जाना है”
माँ ने स्कूल के लिये तैयार किया। किन्तु मेरा मन स्कूल जाने का नहीं था। तभी मैने बुखार का बहाना बना लिया, पर मेरा झूठ पापा के सामने नहीं चलने वाला।
पापा ने गुस्से से कहा- ”स्कूल जाता है या मैं ले जाऊ।”
मेरे लिये इतना ही सुनना काफी था। माँ ने स्कूल बैग और मेरा टिफिन दिया और मैं स्कूल के लिये निकला। आगे जा कर रस्ते में मेरे स्कूल के और भी दोस्त मिले, उनमें से दीपक मेरा बहुत प्रिय मित्र था।
दीपक-”मास्टर जी ने होम वर्क दिया था, कविता याद की या फिर भूल गया।”
तभी मैं अचानक दीपक की बात सुनकर और ज्यादा डर गया और मन ही मन सोचने लगा। ”आज फिर से स्कूल में मास्टर जी द्वारा मुर्गा बनना पड़ेगा।
इतने में दीपक बोला, ”क्या सोच रहा है? कुछ पूछा था, उसका जवाब दिये बिना कहा खो गया।
रोज की तरह आज भी मेरा जवाब नहीं था।
दीपक-”जल्दी चल स्कूल के लिये देर हो रही है।”
मेरा मन स्कूल जाने का बिल्कुल नहीं था, और मैं दीपक से बोला, ”क्यों ना आज पास के तालाब में मछलियाँ पकड़ने चलें।”
दीपक- ”अरे नहीं नहीं मास्टर जी के हाथ मुझे नहीं पिटना है, तू जा मुझे स्कूल जाना है।”
दीपक के बात सुनकर मैं बोला, ”अरे कल रविवार है, मास्टर जी सोमवार तक भूल जाएँगे।”
पहले तो दीपक मेरी बात को नकारता रहा, फिर किसी तरह मैने उसे मना लिया।आखिर वो मेरा सबसे प्रिय दोस्त जो था। तालाब के पास पुरे दिन खेलते रहे। जैसे-जैसे दिन ढलने लगा फिर घर की याद आई।
”चल अब घर चल शाम होने को है” ऐसा मैं दीपक से बोला।
आज में मन ही मन खुश था, मुर्गा बनने से बच गया। किन्तु जब घर पहुँचा तो मास्टर जी और आस पड़ोस के दो-चार लोगों को घर में पाया देख, मेरे पैरों तले जमींन खिसक गई।

(उस दिन को मैं आज भी आज तक नहीं भुला, जब भी किसी स्कूल के बच्चे को देखता हूँ, तो एक पल के लिये अपने बीते दिनों में खो जाता हूँ।)
मास्टर जी- ” बेटा कहाँ थे, आप और दीपक पुरे दिन?” मैं चुप्पी साध के अपने जूते के तनों को देख रहा था।
तभी पापा गुस्से में, ”मोहित बताओगे या फिर छड़ी निकालूँ”।
पापा के डर के कारण मैने सारी बात सच-सच बता दी।
मास्टर जी ने दो-चार ज्ञान की बात बताई और समझाया। फिर सभी लोग अपने अपने घर को चले गये।
इधर पापा को मेरी हरकतों से बहुत क्रोध आया था। पापा ने मेरी बहुत पिटाई की। फिर थोड़ी देर बात प्यार करने लगे। और बहुत सारी बातें समझाने लगे।
उस दिन से मैने स्कूल का कोई भी दिन गोल नहीं किया। समझ की कमी होने से तब मुझे स्कूल जाना और घर पर पढ़ना गन्दा लगता था। तब मुझे ना ही समय का अहसास था और ना ही मेरी पढ़ाई का। किन्तु आज सोचता हूँ, कि मम्मी-पापा ने जो भी किया वो मेरे आज और आने वाले भविष्य के लिये किया।
”समय कभी भी इंसान को वर्तमान का अहसास नहीं कराता,
किन्तु भविष्य, भूतकाल की बातों पर हमें जरूर पश्चाताप कराता है।”
पापा का अनुशासन मेरे लिये एक पथ-प्रदर्शक साबित हुआ।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट