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Wednesday, 25 November 2015

''हसीन जिन्दगी''

निकल पड़ा हूँ,
हसीन जिन्दगी की तलाश में।
बेचैन मन ये
तब से अब तक,
कि मन की उम्मीद पा ना लूँ।
अब रोके ना रुकूँ मैं।
जब तक जिन्दगी को
हसीन लम्हों से सजा ना लूँ।
निकल पड़ा हूँ,
जिन्दगी के नये अन्दाज में।

जिन्दगी के इस आज को
आने वाले सुनहरे पलों की
एक नई मिसाल बना लूँ।
जिन्दगी को और भी
अब खूबसूरत बना लूँ।

आसान नहीं, हसीन
लम्हों का ये सफर।
हर राह, हर मोड़ पर है
जख्मों का नया कहर।
बेख़ौफ मैं भी इस मंज़र से निकलता,
मन में अरमानों का दीया
जला के चलता।
निकल पड़ा हूँ,
हसीन जिन्दगी की तलाश में।

बस हसीन पलों की आस में
हर रोज आगे बढ़ता।
जीवन की मुश्किलों से लड़ता।
मंजिल को पाने की चाह में,
कठिनाइयों का पीछा करता।
निकल पड़ा हूँ,
हसीन जिन्दगी की तलाश में।

दूर से देखा जिन्दगी को
दिखने में हसीन है।
जितना पास आये जिन्दगी के
ये उतनी ही बेहतरीन है।
लम्हें बहुत हैं जिन्दगी में,
हर लम्हा  बहुत कुछ सिखाता।
जिन्दगी की दौड़ में
मुझे हर बात का अहसास कराता।

अब तो जिन्दगी और भी
हसीन सी लगने लगी है।
रंगीन पलों की चाह में,
हर रोज मन को मना कर
मैं आगे बढ़ा हूँ।
ख्वाबों को सच कर,
अब मंजिल के पास खड़ा हूँ।
हसीन जिन्दगी की तलाश में।
अब निकल पड़ा हूँ।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

Friday, 20 November 2015

"मैं सहमा सा, गुमसुम सा''

आज मैं सहमा सा,
आज कुछ डरा सा।
जिन्दगी की राहों में
कुछ यूँ ही अनमना सा।
जाने क्यों मैं खोया सा।
खुली आँखों से सोया सा।
जिन्दगी की जीत के लिये,
मन को सपनों में डुबोया सा।
हर उम्मीद को आस में संजोया सा।
आज मैं सहमा सा।

इस हालात के लिये
कितना सोचूँ।
कभी खुद को तो कभी
अपनी मेहनत को दोषू,
जिन्दगी की चाह के लिये,
कोशिशों की धुन बनाता।
हर मुश्किलों में
खुद को आजमाता।
मन के मत को मैं मनाता ।

आज मैं सहमा सा,
आज मैं गुमसुम सा।
मेहनत की राहों में,
कोशिशों के बोये बीज
इन्तजार की घड़ी में क्यों छिपने लगे हैं।
अब आस है उन बीजों से।
जो उम्मीद के अंकुर से
सफलता के पेड़ बन जाये।
जो सोचा है
जिन्दगी के लिये मैने,
काश मंजिल आसान हो जाये।

वक्त का दौर अब मुझे सताता,
मेरी उम्मीदों के लिये हर रोज डराता।
मेरी आस को कमजोर बनाता।
इन पलों में, क्यों मैं ऐसा?
कभी अनमना तो कभी डरा सा,
आज मैं सहमा सा।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

Thursday, 19 November 2015

''जिंदगी सीखती और सिखाती''

जिंदगी सीखती और सिखाती,
हर पल महकती और महकाती।
जिंदगी की कुछ कोशिशें नई,   
तो कुछ कोशिशें वही।       
मंज़िल भी वही,      
पर राह हैं कई।
मन की उम्मीदें अनेक,
पर उनको पाने की चाहत है एक।
जिंदगी का लक्ष्य एक,
पर जीवन की मुश्किलें अनेक।
जिंदगी सीखती और सिखाती,
हर पल महकती और महकाती।

जिंदगी हर पल,
कितना कुछ सिखाती है।
आज रूठना तो कल मनाती है।
कभी रेश्म सा धागा बुन,
प्यार से दिलों के फ़ासले मिटाती है।
कुछ हल्की से नोक झोक हो,
तो  नफ़रत का बीज बो कर
दो दिलों की नज़दीकियाँ बढ़ा कर,
प्यार भरा हक छिन जाती है।

प्यार से जियो तो
जिंदगी हसीन है।
कुछ पल मीठे,
तो कुछ पल नमकीन हैं।
दिलों मे प्यार भरा हो तो,
दुनियाँ रंगों से भरी है।
अगर हो नफ़रत दिल में यहाँ,
तो खूबसूरत दुनियाँ भी रंगहीन है।

कुछ पल खुशियों में झूमती,
कुछ पल गमों से झुजती।
एक नया एहसास बनकर,
अधूरी ख्वाहिश को पूरा कर,
जिंदगी सीखती और सिखाती।
हर पल महकती और महकाती।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

Tuesday, 17 November 2015

चेहरे

अक्सर चेहरे पढ़ने में,
हर बार ग़लतियाँ कर जाता हूँ।
जो बात किताबों में ना लिखी हो,
वो बात चेहरों के
उतरते नकाबों से सीख जाता हूँ।
चेहरे तो कम हैं यहाँ।
जो मिलते हैं
वो नकाबों से ढके हैं।
बिना बोले बड़े बोल,
बोल जाते हैं कुछ चेहरे।
कुछ बोल कर भी
खामोश कर जाते हैं चेहरे।
हर चेहरा यहाँ
बहुत कुछ सीखा जाता है।
कोई खुशी के बाद गम,
तो कोई गम के बाद
जीना सीखाता है।
चमकीले चेहरे अक्सर
जिन्दगी को सामने से
बहुत लुभाते हैं।
पर हक़ीकतों में
हर शख़्स को
उसकी राह से भटकाते हैं।
सबक़ मिलने पर भी
अक्सर चेहरे पढ़ने में,
हर बार ग़लतियाँ कर जाता हूँ,।
 धीरेन्द्र सिंह बिष्ट
16.11.2015

नेकी

कहानी का सारांश:

 कहानी में मुख्य भूमिका उत्तम नाम के व्यापारी की है, जो एक मेहनती और बुद्धिमान है, जो हमेशा खुद के लिए कुछ करने से पहले, दूसरे लोगों के बारे मे सोचता है। उत्तम अपने जीवन में मुश्किलों का सामना अपनी बुद्धिमत्ता से करता है।  बुराई उसके आस पास हुमेशा उसका बुरा चाहती है, पर वह बुराई से दूर रहकर हमेशा अपनी मुश्किलों का हल निकलता है।    

         सायंकाल का समय है, आसमान मे हल्की लाली छाने लगी है, दिन डूबने से पहले सूरज अपनी दिन की कार्यप्रणाली को पूरा कर रात्रि की तैयारियों मे जुटा है, हल्की ह्वाएँ अपने सुर में गा रही हैं, मौसम का मिज़ाज भी  बहुत सुहाना है।

कुछ व्यापारियों के साथ उत्तम तीव्र गति से एक शहर से दूसरे शहर की ओर बढ़ रहा है। पैदल सफ़र तय करते-करते सभी व्यापारियों की गति धीमी होने लगी है। व्यापारियों की दशा देखकर,

उत्तम- "थोड़ा विश्राम किया जाय''

"हाँ बहुत थक गये अब और नही चला जाता, मेरे तो हाथ पैरों ने जवाब देना शुरू कर दिया है''-दूसरे व्यापारी ने उत्तम से कहा!

उत्तम- ''ठीक है पास के एक ढाबे में तोड़ा विश्राम कर लेते हैं, फिर यात्रा प्रारंभ करेंगे।

इतना कहॅकर सब ढाबे की तरफ बढ़ने लगे।

ढाबे मे पहुँचकर सभी व्यापारियों ने जलपान किया और आराम फरमाने लगे।

      कुछ ही देर में आसमान तारों से चमकने लगा, और सभी व्यापारियों ने अपना सफ़र तय करना शुरू किया।

चलते चलते रात बहुत हो चुकी थी।

उत्तम ने व्यापारियों से कहा- "रात काफ़ी हो गई है काफिले को यही पड़ाव डाल लेना चाहिए।''

उत्तम की बात मान कर व्यापारियों ने अपने टेंट लगा लिए और विश्राम करने लगे। रात्रि के कुछ पल बिता कर सभी व्यापारियों ने अपना मार्च शुरू किया। थोड़ी देर बाद शहर आ गया, सभी व्यापारी व्यापार स्थल मे पहुँचे और अपना कार्य करने लगे।

सभी लोग अपने काम मे इतना व्‍यस्त हैं कि समय का पता नही चला। व्यापार का कार्य पूरा कर सभी व्यापारी अपने घर पहुँचे। उत्तम को घर पा कर उसके माता पिता खुश हुये।

"इस बार तो बेटा तुम समय पर आ गये इससे ज़्यादा खुशी ये है की त्योहार के समय तुम हमारे साथ  हो" - उत्तम के पिता बोले।

उत्तम- "पापा सारा सौदा त्यौहार की वजह से जल्दी-जल्दी हो गया।"

पन्नालाल- "चलो अच्छा है, ईश्वर की कृपा है।

बेटे उत्तम की रात दिन की मेहनत पर उनके पिता पन्नालाल बहुत खुश थे। उत्तम अपने काम और लगान से बहुत बड़ा व्यापारी बन गया। अब उसे व्यापार के लिए बाहर नही जाना होता है, उसने व्यापार के लिए कई सारे लोग नियुक्त किये। उत्तम का व्यापार अच्छा चलने लगा। कुछ समय बाद उत्तम की पत्नी उर्वशी ने पुत्र  को जन्म दिया। पुत्र की प्राप्ति से से दोनों पति पत्नी और सभी लोग खुश थे। 

        कुछ समय उत्तम एक बड़े व्यापारी के रूप में जाना जाने लगा। उदार स्‍वभाव होने के कारण उसने अपना कारोबार का संचालन अपने सगे सम्बंधियों को शौपा। पैसों की माया देखकर उसके कुछ सखे सम्बन्धियों ने उसके साथ धोखा कर उत्तम के कारोबार को हाथिया लिया। बेटे की मेहनत की पूँजी इस तरह लूटता देख पन्नालाल को अचानक दिल का दौरा आया और उनका देहान्त हो गया। पिता की मौत से उत्तम पूरी तरह से टूट गया था। इधर घर की स्थिति बहुत दयनीय होने लगी थी, मजबूरी मे आ कर उत्तम को अपना घर बेचना पड़ा। बूढ़ी माँ, पत्नी अपने नन्हे १ वर्षीय बालक को लेकर उत्तम शहर की ओर निकला। "हे भगवान मैं तेरी हर परीक्षा देने के लिये तैयार हूँ, पर मेरे परिवार की ये दशा मुझसे देखी नही जाती।'' मन ही मन सोचता हुआ उत्तम आगे बढ़ा। तभी रास्ते में एक व्यापारियों का काफिला मिला, जिसमें एक बड़ा व्यापारी जो उत्तम के साथ कभी शहर शहर जाकर व्यापार किया करता था। उत्तम को  देखकर व्यापारी को बड़ा आश्चर्य हुआ और कहने लगा- "ये क्या हाल बनाया है आपने, इतनी धूप मे ये बच्चे को कहाँ घुमा रहे हो?"

उत्तम- "मेरे सगे सम्बंधियों की वजह से मुझे आज अपने परिवार के साथ दर-दर घूमना पड़ रहा है।''

उत्तम ने सारी व्यथा उस व्यापारी को सुनाई, उत्तम की बात सुनकर व्यापारी को बहुत दुख हुआ। उसने उत्तम को अपने काफिले मे शामिल होकर फिर से कार्य करने की सलाह दी, किंतु उत्तम ने व्यापार वाला काम फिर से करने के लिए मना कर दिया।

उत्तम- ''वर्षो की मेहनत से जमा किया धन एक पल में मुझसे दूर हो गया है, मेरा उस काम में मन नही है।

व्यापारी- ''और दूसरा कौन सा कार्य है जो आप करोगे, व्यापार के कार्य मे तो आपको महारथ हासिल है। जो हुआ उसे भूल जाओ, एक नये सिरे से अपना कार्य शुरू करो।

उत्तम- ''कार्य तो में नये सिरे से शुरू करूँगा पर व्यापार का नही इसके लिए आपको मुझे कुछ मदत करनी होगी।

व्यापारी- ''ठीक मैं आपके साथ हूँ, पर आप कौन सा व्यवसाय करने वाले हो?

उत्तम- ''मैं सूती ग्रामोद्योग का कार्य शुरू करने वाला हूँ, बस आपके सहयोग की ज़रूरत है।

व्यापारी उत्तम की बात सुनकर खुश हुआ और उसकी मदत लिए सहमत हो गया। उत्तम को व्यापारी ने उधार के रूप मे कुछ राशि देकर चला गया।

        फिर क्या था उत्तम ने पास के ही गाँव से एक छोटे अनुपात में कपास खरीदना शुरू किया, पहले तो उत्तम ने रज़ाई और अन्य वस्तुएँ घर पर अपने परिवार की मदत से ही तैयार करता फिर बाज़ार मे उसे बेच आता। ये सब उत्तम ने एक वर्ष तक किया। कुछ समय बाद गाँव मे किसानों की एक प्रदर्शनी में उसने अपनी एक छोटी से दुकान लगाई। जिसमे उसे बहुत मुनाफ़ा हुआ और प्रदर्शनी समिति ने उत्तम को उसके कार्य के लिए सम्मानित किया। और उत्तम को ग्रामीण बैंक से कुछ राशि ईनाम के रूप में प्रदान की। उत्तम बहुत खुश हुआ और उसने मन ही मन सोचा ''अब थोड़ा पैसे भी आ गये हैं, कारोबार को थोड़ा बढ़ाया जाय।

        अगले दिन अपने बेटे के साथ वह शहर गया उसने छोटे उद्योग के लिए कुछ मशीनें खरीदी और गाँव में एक छोटा सा उद्योग लगाया। शुरूवात में उत्तम को बहुत कठिनायों का सामना करना पड़ा। उद्योग में कार्य करने के लिये उत्तम ने गाँव के कुछ लोगों को नियुक्त किया। उत्तम के कारोबार को यूँ बढता देख, उत्तम लोगों की आखों मे चुभने लगा। गाँव के कुछ गन्दी मानसिकता वाले लोगों ने गाँव के भोले भाले लोगों को उत्तम के खिलाप भड़काना शुरू कर दिया कि,

''उत्तम आप लोगों से सस्ते दामो में कपास और भेड़ की ऊन खरीदता है, और वह खुद उसे ऊँचे दामों में बेच कर अच्छा मुनाफ़ा कमाता है।''

फिर क्या था उत्तम को गाँव वालों ने कपास और भेड़ की ऊन देना बन्द कर दिया। कच्चा माल नही मिलने से उत्तम को भारी नुकसान उठाना पड़ा। मन ही मन उत्तम बहुत दुखी हुआ और सोचने लगा, ''ये सब अचानक कैसे हुआ? सब ठीक चल रहा था और गाँव वालों ने अचानक अपना फैसला बदल क्यों दिया। इसके पीछे कुछ तो साजिश है।"

आख़िर में उत्तम ने सोच समझ कर एक फ़ैसला लिया, उसने सारे कच्चे माल के व्यापारियों की बैठक अपने घर में बुलाई और सभी को गाँव से कच्चा माल खरीदने से मना कर दिया। इधर पूरे गाँव मे अपने उद्योग को बेचने की झूठी अपवाह फैला दी। अब क्या था गाँव वालों की परेशानी और बढ़ने लगी। अन्त में गाँव वाले निराश होकर उत्तम के पास आये और अपने किये पर शर्मिंदा होकर माफी माँगने लगे।

''हमें माफ़ कर दो, हम से बहुत भूल हुई है। कुछ लोगों के बहकावे में आकर हम सभी ने अपना और आपका बहुत नुकसान किया है, उद्योग को बेचकर आप हमें और सज़ा मत दिजिये। हम कच्चा माल अब से आपके उद्योग में देंगें।"
उत्तम- ''ये उद्योग हम सब की गुजर बसर का साधन है, इसी उद्देश्य से मैने गाँव में ये उद्योग लगाया है। मुझे उद्योग नहीं बेचना पर इसके लिये आगे क्या भरोसा की आप लोग उद्योग को लिये कच्चा माल दोगे।''
उत्तम की बात सुनकर गाँव के मुखिया ने उत्तम को भरोषा दिलाया कि आगे भी उद्योग को बराबर कच्चा माल मिलता रहेगा।

उत्तम गाँव वालों का स्वभाव जनता था, वह किसी का ग़लत नही सोचता इसलिय उसने ये युक्ति बनाई थी। गाँव वालों ने कच्चा माल देना शुरू किया, उत्तम का कारोबार धीरे धीरे उच्चाइयों को छूने लगा। उत्तम ने व्यापारी से लिया ऋण ब्याज के साथ चुकता कर दिया।

“बुरा व्यक्ति लाख कोशिश कर ले,
पर नेकी पर चलने वाले व्यक्ति के सामने,
हमेशा अपना सर झुकाता है।’’

अपनी मेहनत और लगन से उत्तम ने अपना वही नाम वह सौहरत फिर से हासिल कर ली। अपनी बुद्धिमत्ता और लगन से उसने हर कठिनाइयों का सामना कर जीवन में सफला हुआ।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

"देव भूमि उत्तराखण्ड"

ये देव भूमि मेरी,
ये पावन भूमि मेरी।
ये जन्म भूमि मेरी,
ये कर्म भूमि मेरी।

हिमालय की तलहटी पर बसी,
नदियों के संगम से बनी।
एक तरफ गंगा तो दूजी तरफ यमुना,
अपने शीतल जल से करते सबको निर्मल यहाँ।
ये देवों की भूमि मेरी,
ये सुंदर भूमि मेरी।

है मसूरी पर्वतों की रानी,
जिसकी ठंडी हवायें सुनाती
सबको इसकी सुंदर कहानी।
बर्फ का आंचल ओढ़ कर,
पर्यटकों का मन मोहकर,
दिलों मे दस्तक देती है सुहानी।
ये उत्तराखंड भूमि मेरी,
ये पर्यटन भूमि मेरी।

शांति और रोमांच के
मधुर मधुर जो गीत सुनाता,
हर इक मोड़ पे देखो अनोखी
प्रकृति की छटा दिखाता।
योग राजधानी के रूप में ऋषिकेश
दुनिया में जाना जाता।
ये देव भूमि मेरी,
ये सुंदर भूमि मेरी।

प्रभु हरी के नाम पर,
है बसा हरिद्वार यहाँ पर।
है केदारनाथ और बद्रीनाथ धाम भी,
इन तीर्थों के साथ यहाँ पर।
पूरी हो जाती है सबकी
मनोकामना आकर यहाँ पर।
ये देवों की भूमि मेरी,
ये पावन भूमि मेरी।

प्रभु विराजे खुद आकर जहाँ पर,
धन्य हूँ जो मैं जन्मा यहाँ पर।
देवों ने बनाई, अनेक तीर्थों से सजाई,
ये उत्तराखंड भूमि मेरी।
ये सुंदर भूमि मेरी,
ये पावन भूमि मेरी।
ये देव भूमि मेरी।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

"दोस्त"

हो साथ वो,
तो सपने भी अपने हो जाते हैं।
हो करीब वो तो,
हर पल को हसीन बना जाते हैं।
हो भूल कोई हमसे,
फिर भी अपनाते हैं।
हर जरूरतों पर मुझमें वो,
एक नई उम्मीद जगाते हैं।
हर कमी पर प्यार की बारिश कर
मुझे हर ख़ुशी का अहसास करा जाते हैं।
दोस्त मेरे हैं वो,
जो मेरी जिन्दगी को फूलों सा महकाते हैं।

हो साथ वो,
तो मुश्किल को आसां कर जाते हैं।
पाकर उनको ऐसा लगा जैसे,
दुनियाँ की हर ख़ुशी मेरे पास है।
रूठ भी जाऊँ उन से,
अपना समझ कर मना लेते हैं।
साथ बिताऊँ हर पल मैं उनके,
तो जिन्दगी को,
यादगार हिस्सा बना जाते हैं।
हो साथ वो,
तो जिन्दगी को महकाते हैं।

गम तो बहुत हैं,
ख़ुशियों का पता नहीं।
हैं साथ मेरे वो दोस्त,
मुश्किलों का दौर भी
आसान है।
दोस्त मेरे ऐसे,
जो हर को जीना सिखाते हैं।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

"बेकारी"

बेकारी ने ये मुझ पे,
हाय ये! कैसे सितम हैं ढाले।
जिन्दगी की गुजर-बसर में,
पैरों में पड़ गये छाले।

बेकारी ने…………….,

हर रोज घर से,
ये सोच के निकलता हूँ,
आज अपनी साक्षरता से,
अपनी बेकारी को दूर कर लूँ।
पर मेरी सोच केवल ,
मेरी सोच तक रह जाती है।

भ्रष्टाचार मेरी साक्षरता को,
मेरी बेकारी की कीमत दे जाती है।
सिफारिश की प्रथा आज,
देश के युवाओं को बहकाती है।

रिश्वत साक्षर लोगों को नकार कर,
युवाओं को बेकार बनाती है।
भ्रष्टाचार की ये प्रथा,
देश को अंधियारे में ले जाती है।
अगर ना होगी बेकारी,
तो ना ही होगी ये भ्रष्टाचारी।

आओ मिलकर भ्रष्टाचार मिटायें।
देश से बेकारी हटायें।
भारत को उन्नत और खुशहाल बनायें।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

"आईना हूँ मैं,"

आईना हूँ मैं,
उस चेहरे का।
जो चेहरा अपनी चमक पहचानता है।
सीसा नहीं हूँ मैं।
जो पत्थर से तोड़ दिया जाता है।

दीपक हूँ उस शाम का,
जो अज्ञान की रातों में
जला के छोड़ दिया जाता है।
लौ हूँ मैं
उस ज्ञान की बाती का।
जो जला कर छोड़ दिया जाता है।

मेरी कोशिश
मेरी करनी है।
मेरी कामयाबी
मेरी सोच है।
मुश्किल है सफर,
पर तय करना जरूर है।

आईना हूँ मैं
उस चेहरे का।
जो चेहरा अपनी पहचान बनाना जनता है।
वो काँच नहीं मैं।
जो आँखों में चुभना जनता है।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

"उठो देश के नौजवानों"

उठो देश के नौजवानों।
स्वयं की सामर्थ्य को पहचानो।
अपने तेज को बहार लाओ।
देश की दशा में सुधार लाओ।
भारत माँ को हमारी जरुरत है।

उठो देश के नौजवानों।
अपने लक्ष्य को पहचानों।
जो देश,
हमारी सीमा में झांक रहा।
जो घुसपैठ,
हमारी सरहद को ताक रहा।
सर कलम करें,
उन घुसपैठियों का।
आओ सबक सिखायें।
उनकी इस नापाक हरकत का।

उठो देश के नौजवानों।
अपनी स्मरण शक्ति को पहचानों।
कही जातिवाद देश को डस रही है।
तो कही आरक्षण देश में आग उगल रही है।
व्यर्थ विवादों से दूर रहो।
देश की आन्तरिक शक्ति को मजबूत करो।

उठो देश के नौजवानों।
आपस में भाईचारे को पहचानों।
आओ एकता का धागा पिरोयें,
राष्ट्र् को एक बँधन में संजोये।
आओ ख़ुशी के बीज बोयें।
गमो की झाडियों को कांटें।
सुख के पल आपस में बाँटे।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

"संगत की रंगत"

ऐसी प्रशंसा किस काम की,
जो तारीफ भी खुले दिल से न कर पाये।
वो संगत की रंगत किस काम की।
बचपन में कहते आये दोस्त जिनको,
बदलते वक्त की करवट पर,
ऐसी यारी किस काम की।

बचपन का था याराना,
उपलब्धियों को बीच लाकर,
बेगाने बन गए।
सोचा जिनको अपना,
वक्त आने से पहले,
वही लोग पराया कर,
संगत की रंगत दिखा गये।

हर वक्त को अपनाया हमने,
पर वक्त ने आजमाया हमको।
फिर भी मन को मनाकर,
जीवन पथ पर बढ़ते गये।
उपलब्धियों को पाकर,
दोस्तों को भूलाकर
ऐसी महारथ किस काम की।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

"काश.! कि लौट आये बचपन"

काश कि, लौट आये बचपन।
अपनी धुन में गाये बचपन।
दादा की गोद झुलाये बचपन।
पापा की अँगुली थाम कर।
फिर से कदम मिलाये बचपन।

काश कि, लौट आये बचपन।
क्या सुख है, क्या दुःख है
इसकी चाह को भुलकर ,
माँ के आँचल को अपनाकर,
फिर से लाड़ लड़ाये बचपन।

काश कि, लौट आये बचपन।
चन्दा की लोरी गा कर,
नन्हे कान्हा का रूप बनाये बचपन।
खुशियों में खुश होकर,
नटखट बाल लीला दिखाये बचपन।

काश कि, लौट आये बचपन।
क्या दौलत क्या शोहरत,
इसकी लालशा से दूर,
केवल माँ के प्यार की
पूँजी पाये बचपन।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

"माँ का लाड़"














दफ्तर से घर वापस आया।
चेहरा देख मेरा मुरझाया।
दर्द में माँ ने मुझको पाया।
बोली माँ लाड़ लगाकर,

सीने से माँ मुझे लगाकर।
इतना गुमसुम क्यों है लाल,
क्यों उड़ा है, चेहरे का गुलाल।

नन्हा सा तू मेरा मुन्ना।
क्यों है फिर तू इतना सुना सुना।
सिर दुःख रहा है,
माँ से बोला।
दुःख से मुझे दुःखी देखकर।
फिर माँ ने मुझे बैठाया,
प्यार से सिर पे हाथ घुमाया।

तब जा कर के सुकून पाया।
दुःख मेरा नहीं देखा जाता।
जब तक मै घर वापस नहीं आता।
माँ के मन को चैन नहीं आता।
माँ का लाड़ मुझे है भाता।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

"हार मान ना होना जिन्दगी"

हार मान ना होना जिन्दगी।
दुखों में ना रोना जिन्दगी।
मुश्किलों में सबर ना खोना जिन्दगी।
अँधेरे में गुम ना होना जिन्दगी।

हार मान ना होना जिन्दगी।
कोशिश कर, हार ही
मंजिल की जीत तय करेगी।
दुःख के बादल अब छट ने लगे हैं।
सुख की घटा अब छाने लगी है।
मुश्किलें अब आसान होने लगी है।
मंजिल की राहें फिर से
नई दिखने लगी है।

हार मान ना होना जिन्दगी।
मायूसी का अँधेरा
अब छट ने लगा है।
मन की उम्मीदें अब बढ़ने लगी हैं।
आशा की किरणें
अब मन में उमड़ने लगी हैं।
मुश्किलों की डगर
अब आसान होने लगी हैं।

हार मान ना होना जिन्दगी।
सुख का क्या है,
इंसान को ऊँचाई के सपनों से
रूबरू कराती है।
अक्सर सुख पाने की चाहत,
इंसान को दुःख में
निराश बनाती है।
दुःख इंसान को मजबूत बनाता है,
जीवन की गहराइयों का
आभास कराता है।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

"माँ सरस्वती जी की वन्दना"










मै नमन करूँ,
मै नमन करूँ।
शीश झुका कर,
मै नमन करूँ ।
माँ सरस्वती तुम्हारा वंदन करूँ।
हे वीणा वादनी,
हे ज्ञान दायनी।
माँ तेरा मै अभिन्दन करूँ।

मै नमन करूँ,
मै…………..,

दे ज्ञान का वो वरदान मुझे,
छा जाऊँ समूचे विश्व में।
सद् बुद्धि दे,
सद् मार्ग दे।
माँ मेरा कल्याण कर,
बेटे का जीवन सवार दे।

नमन करूँ मै,
मै………….,

भाग्य बनाऊँ सत कर्म से,
इच्छा फल पाऊँ,
अपनी लगन से।
ऐसा माँ सामर्थ्य दे।

नमन करू मै,
नमन करूँ।
पुष्प अर्पण कर,
माँ तेरी मै वन्दना करूँ।।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट
(29.09.2015/5:45 am)

"खामोशी बहुत कुछ बोलती है"

खामोशी बहुत कुछ बोलती है।
लोगों के दिल का राज खोलती है।
बिन कहे बहुत कुछ कह जाते हैं लोग,
बहुत कुछ बोलकर भी

खामोश हो जाते हैं लोग।
ऐसा क्या है ख़ामोशी में?
जो दिल का हाल बयां कर,
दिल में दस्तक दे जाती है।

खामोशी बहुत कुछ बोलती है।
वो शख्स भी बोल कर,
खामोश रह गया।
जो मेरे अन्दाज को,
मेरी ख़ामोशी समझ गया।

उसे क्या पता,
उसका बोलना भाता था हमको।
ना चाह कर भी,
खामोश रहना आता था हमको।

तब मेरी ख़ामोशी को
समझ लेता था वो शख्स।
पर आज सुनकर भी
अनसुना कर जाता है वो शख्स।

खामोश रहना छोड़ दिया हमने।
बीते पलों के बारे में
सोचना छोड़ दिया हमने।
वो ख़ामोशी बहुत कुछ दिखा गई।
मंजिल की दौड़ में आगे बढ़ना सीखा गई।
©धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

27.09.2015/5:00 pm

"माँ प्यार का सागर"



















माँ प्यार का सागर है।
माँ सुख की गागर है।
माँ प्यार की मूरत है।
माँ दया की सूरत है।

माँ एक कंचन काया।
माँ हमारे जीवन की छाया है।
माँ एक इबादत है।
माँ बचपन की आदत है।
माँ शब्द बड़ा अजूबा है।
इसके जैसा न कोई दूजा है।

कोटि कोटि नमन तुझे है माँ,
जो तूने मुझे अपना रूप दिया।
दुनिया में आने का एक प्रारूप दिया।
माँ मान तेरा बढ़ाऊंगा,
हर वो कोशिश करता जाऊँगा।
माँ प्यार का सागर है।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

"बाल मजदूरी"

घर से मंजिल की तरफ निकला।
राह में एक ढाबा मिला।
ढाबों में कुछ नन्हें सितारों से मिला।
देख कर उनकी ये दशा,
मन को उस पल शुकून ना मिला।

एक फेरी के गाने गा रहा।
तो एक बर्तन के बाजे बजा रहा।
ना तन पर हैं पूरे कपड़े,
ना पैरों पर हैं उनके जूता।

हाथों में हैं छाले।
कलम किताबों की जगह,
थमा दिए हैं चाय के प्याले।
एक किस्मत की लकीरों से,
मेज की जूठन मिटा रहा।
तो एक चूल्हे में अपनी किस्मत जला रहा।

तभी सोचा देश की नींव ऐसी,
तो इमारत होगी कैसी।
देखा तो क्या देखा।
भविष्य देश का अंधियारे में देखा।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

"शब्दों के बीज"

पुरानी कहावतों में सच्चाई
और गहराई नजर आती है।
फिर क्यों आधुनिक लोगों की बातों में
केवल चतुराई नजर आती है।

नाम के लिए जीया करते थे वो लोग।
फिर क्यों नाम डुबाने के लिए जी रहे हैं,
आधुनिक युग के कुछ लोग।
हर सुख दुःख में संयम और सुकून था उन्हें।
पर आज दुःख में संयम खो कर,
सुख में क्यों इतराते है लोग।

आपस में सदभावना का पाठ पढ़ा कर,
लोगों को एक बन्धन में
लाना चाहते थे वो लोग।
फिर क्यों आज आपस में
दुर्व्यवहार कर,
लोगों में फूट दिलाते हैं कुछ लोग।

शब्दों की बोली से
फूल बरसाते थे वो लोग।
फिर क्यों आज शब्दों के बोल से
लोगों के मन को आहत पहुँचाते हैं कुछ लोग।

जीवन में अच्छी प्रेरणा देकर,
मन में आशा के बीज बोते थे वो लोग।
फिर क्यों आज जातिवाद की भावना जगा कर,
आपस में नफरत के बीज बोते हैं कुछ लोग।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

"मन के गीत"

मन के गीत में
यूँ ही गुनगुनाता चला।
कोशिश के दीप मंजिल की
राहों में जलाता चला।

मन में आशा की
एक नई दुनिया बसाता चला।
मंजिल को पाने की लगन में,
यूँ मदमस्त चलता चला।
मानों मन की आशा को
पूरा करने का जुनून सा खिला।

कठिनाइयों ने रोका,
मुश्किलों ने टोका।
पर खुद को ना रोका,
बढ़ता चला।
मन के गीत में
यूँ ही गुनगुनाता चला।
मन में लगन की ज्योत
जलाता चला।
उम्मीद की किरण
अपने अंदर बसाता चला।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

"मतलब की ये दुनिया"

मतलब की ये दुनिया।
मतलब के लोग यहाँ।
मतलब का है याराना।
चलना जरा संभलकर यहाँ।

अगर पाना है कुछ यहाँ,
तो मेहनत के गुर आजमाना।

बढ़ता है वही यहाँ,
जो लोगों को जानता है यहाँ।
पिछड़ता है, वो यहाँ,
जो अपनों पर कम, गैर पर ज्यादा
भरोसा करना जनता है यहाँ।
मतलबी लोग मतलबी दुनिया।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट
13.07.2015

"औलाद"

ऐसा भी क्या बड़ा होना।
जो सपनो को पूरा कर,
माँ बाप से दूर होना।
ऐ इंसान पाकर भी
तूने सब खो दिया।

सोचा न था कि किस्मत,
उनको ये दिन दिखायेगी।
उनके ही बेटे,
उनको आज दर
दर की ठोकरें खिलायेंगे।

ये आशा न थी,
उनके मन में।
जिन बेटों की परवरिश
स्वयं दुःख पाकर सुख से की।
आज वही बेटे माँ बाप को क्यों भूल गये।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

"सीखो तुम सभी से"

सीखो तुम सभी से,
पर कोशिश स्वयं करना।
जीवन में दूसरों के भरोसे बैठकर,
स्वयं को बेकार ना करना।

अपनों का प्यार,
आशीर्वाद लेकर ही आगे बढ़ना।
लगेगी आसान हर मुश्किल डगर।
पर कोशिश तुम स्वयं करना।

आसान नहीं मंजिल
पर कोशिश स्वयं करना
कठिनाइयां बहुत है
मंजिल की राहो में,
पर कोशिश स्वयं करना।
 
गिरकर तुम स्वयं उठना।
सहारा तुम भले ही बनना,
पर दूसरों का सहारा ना लेना।
गिरकर उठना,
पर उठकर नहीं गिरना।
सीखो तुम सबसे,
पर कोशिश स्वयं करना।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

"भूल ना कर"

इस बात की तू भूल ना कर।
लोगों से अपना उल्लू सीधा ना कर।
कोई ना जाने वक़्त के हेर।
कब मिला दे उसी से फेर।

दुनिया ये गोल है।
बस प्यार भरे दो बोल हैं।
किस भृम में तू डूबा है।
जो बीज आचरण के
लोगों में तू बोएगा।

उसी के फल तू पायेगा।
वक़्त का तुझे अहसास नहीं।
इस बात की तू भूल ना कर।
लोगों से अपना वैर ना कर।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

"नारी समाज का दर्पण"

नारी समाज का दर्पण है।
हम सब इस पर अर्पण हैं।
भू से लेकर नभ तक,
कोई जगह अछुई नहीं।
 
हर जहाँ पे नारी ने आज,
अपनी जीत का परचम लहराया है।
इस युग को एक नई राह पे,
नारी ने चलना सीखाया है।
 
इस मंजिल को पाने में,
कई मशकत, कठिनायों में,
नारी को संघर्ष करना पड़ा।
नारी समाज की आशा है।
जीवन जीने की परिभाषा है।

 नारी समाज का दर्पण है।
 हम सब इस पर अर्पण हैं।
नारी सृजन एवं सबलता का अहसास है।
नारी श्रद्धा और दया वाश है।
अबला नहीं आज ये सशक्त है।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

"मन की लालसा"

मन की लालसा ने मुझे पुकारा।
छू ले गगन, बन एक तारा।
रोशन कर दे इस जग को तू।
बन सबकी उम्मीदों का सितारा।

अरमान तो दिल में बहुत हैं, तेरे।
पर ये है मंजिल का नया इशारा।
मन की लालसा ने मुझे पुकारा।
बन जगत का तारा।

हार मान ना होना तू।
बनना है तुझे, सबका सहारा।
किया सफर, जो राहों में तू ने।
वो मंजिल की डगर अब दूर नहीं।
जलाता जा यूँ दीपक आशाओं के मन में।
मंजिल से अब तू दूर नहीं।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

"नशा नाश है"

नशा जीवन का नाश है।
समाज का विनाश है।
नशा उन्नति में बाधा है।
समाज में इसकी पकड़ ज्यादा है।

उजाड़ा नशे ने घरों को।
बिगाड़ा नशे ने मासूमो को।
कितनों को बेघर किया।
युवाओं को बर्बाद किया।

नशा जीवन का नाश है।
समाज का विनाश है।
आओ मिलकर प्रण लें।
मन में दृण संकल्प लें।
नशा मुक्ति अभियान चलायें,
देश को आगे बढ़ाये।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

"बेटी एक वरदान"

बेटी एक वरदान है।
समाज का कल्याण है।
बेटी एक आस है,
देवी का वास है।

बेटी ही वृद्धि है,
धन और समृद्धि है।
भ्रूण हत्या पाप है,
समाज का अभिसाप है।

आओ मिलकर हाथ बढ़ाये,
बेटी बचाओ,
अभियान चलाये।
समाज में बेटी को सम्मान दिलाये।
बेटी एक वरदान है।

उन पापियों का नाश करें,
समाज से पर्दाफ़ाश करें।
बेटी एक वरदान है,
समाज का कल्याण है।

बेटी एक गौरव है।
समाज का सौरभ है।
बेटी हो तो सब सुख चैना,
बिन बेटी के जग है सुना।
बेटी एक वरदान है।
समाज का कल्याण है।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

"मैने सीखा"



फूलों से मैने हँसना सीखा।
नन्हे पेड़ों से आगे बढ़ना सीखा।
खेतों से मेहनत करना सीखा।
फसलों से गर्व करना सीखा।
फूलों से मैने हँसना सीखा।

पापा से परिश्रम करना सीखा।
माँ से प्यार करना सीखा।
लोगों से आगे बढ़ना सीखा।
फूलों से मैने हँसना सीखा।

पुस्तक से मार्गदर्शक बनना सीखा।
अध्यापक से ज्ञान बटना सीखा।
मित्रों से मिलकर रहना सीखा।
फूलों से मैने हँसना सीखा।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

"इंसान''

हे इंसान, है क्यों,
तू इतना परेशान।
सुख में भी
और दुख में भी।
आखिर क्या है,
तेरे अरमान।
दूसरा सुखी है
पर क्यों तू दुखी है।
दूसरा दुखी है,
पर क्यों तू सुखी है।

हे इंसान, है क्यों,
तू इतना परेशान।
दूसरों पे भेद भाव
क्यों करता है।
आखिर हम सब हैं
कुदरत की सन्तान।
क्या पाया, क्या खोया,
उसका तुझे गम नहीं।

खुद तू कुछ कर नहीं पाया।
जो मेहनत करे,
वो तुझको नहीं भाया।
अपनों को गिरा कर,
खुद को आगे बड़ा कर।
किया तूने अपमान।
हे इंसान,
क्या है तेरे अरमान।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

"हिन्दी भाषा''

मेरी आशा, हिन्दी भाषा।
जिसने बदली है,
मेरे जीवन की परिभाषा।
मिला मुझे वो ज्ञान,
बनी नई पहचान इससे।
मन में है नई जिज्ञासा।
मेरी आशा, हिन्दी भाषा।

पाया है मैने, पाउँगा इससे।
छाया हूँ मै, छा जाऊँगा इससे।
लिखा है मैने, लिखूँगा इसे।
बढ़ा हूँ मै, बढूंगा  इससे।
मेरी आशा, हिन्दी भाषा।

अपनाओ ये आशा, हिन्दी भाषा।
दोहराओ तुम भी,
आपस में हिन्दी भाषा।
बने ये सबकी आशा, हिन्दी भाषा।
प्रचार बड़े प्रसार बड़े,
पुरे देश में हिन्दी का संचार बड़े।
मेरी आशा, हिन्दी भाषा।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

"कुछ कहना चाहती है जिन्दगी''

कुछ कहना चाहती है जिन्दगी।
सपनो को पूरा कर,
एक नई मिसाल बनना चाहती
है जिन्दगी।
मंजिल का सफर तय कर,
जीवन में उपलब्धियां
हासिल करना चाहती है जिन्दगी।

कुछ कहना चाहती है जिन्दगी।
भीड़ को पीछे छोड़ कर,
आगे बढ़ना चाहती है जिन्दगी।
मंजिल की डगर मुश्किल है मगर,
चलना है सम्भलकर।
शायद ये बात बताना
चाहती है जिन्दगी।

अकसर हार कर,
बैठ जाता हूँ यूँ ही।
मन में सपनों की दुनिया
बनाता हूँ यूँ ही।
मेरी हार ही मेरी जीत तय करेगी।
इस बात को उम्मीद बनाकर।
जीवन के समुन्दर में
कोशिशों के गोते लगाता हूँ यूँ ही।

इन सब की चाह में
जिन्दगी कितना कुछ सिखाती है।
मंजिल को पाने की राह में
जिन्दगी कैसे
कैसे दिन दिखाती है।
घबरा के सबर पा लिया।
कुछ पाकर कुछ खो लिया।
कभी रो लिया कभी हँस लिया।
जिन्दगी ने जो प्यार से दिया,
उसको मैने कबूल किया।

खो कर पाना अच्छा लगता है।
पर किसी बात को भुलाकर
दोहराना बुरा लगता है।
जिन्दगी ये सब बताना चाहती है,
मुश्किलों को आसान बनाना चाहती है।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

"रोते हुये आया, रुलाकर जायेगा''

रोते हुये तू आया था,
और रुलाकर जायेगा।
कुछ पल नफरत से बिता लिये,
अब कुछ पल प्यार से निभा ले।
जिन्दगी का क्या है,
आज हँसा दे,
ना जाने कब रुला दे।
भ्रम को भुला कर,
हकीकत को अपना ले।

रोते हुये तू आया था,
और रुला कर जायेगा।
अपने लिये तो बहुत जी लिया,
अब नाम के लिये जी ले।
तारीफों के पुल से उतरकर,
जिन्दगी को हकीकत से जी ले।

रोते हुये तू आया था,
और रुला कर जायेगा।
चन्द पैसों पर अभिमान ना कर।
समय की बारिश में
मैल बनकर बह जायेगा पैसा।
जो बच भी गया
वो सब यही धरा रह जायेगा।
शोहरत प्यार की कमा ले
अपने साथ लेकर जायेगा।

रोते हुये तू आया था,
और रुला कर जायेगा।
अब तक जो किया,
उस भूल को भुला कर,
सभी को अपना कर,
हर दुःख में साथ निभा कर।
चलता चला चल।

जिस आज के गरूर में है तू
ये आज उस रेत की तरह है,
जो तेरी मुट्ठी से फिसल रही है।
खाली हाथ आया था,
और खाली हाथ जायेगा।
केवल तुझे सफेद चादर में
भेज दिया जायेगा।
रोते हुये तू आया था,
और रुला कर जायेगा।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

Friday, 13 November 2015

मतलबी दौर

मलतब के लोगों में
अजनबी सा खुद को
लगने लगा हूँ।
बदलते वक्त के दौर में
पाकर भी सब कुछ खोने लगा हूँ।
ऐसी सौहरत का भी क्या कहना,
जिनको पाकर खुद को
अपनों से दूर करना।
हर पलों को मैंने अपना बनाया।
आने वाले दौर के लिये,
उस वक्त को अपनी यादों में सजाया।
उम्मीद से ज्यादा जिसे
अपना समझने लगे,
पर बदलते दौर में वो
शब्दों के नये तीर चुभोने लगे।
तब से अब तक
वफा के नाम से ही
मैं डरने लगा हूँ।
मतलबी लोगों के नाम से,
मैं डर कर काँपने लगा हूँ।
अक्सर जरूरतों में जो,
अपनी फ़रियाद सुनाया करते थे।
पर बदलते वक्त के दौर में,
आज खुद को वक्त का
विधाता समझने लगे हैं।
हर पल को हमने अपनी
इबादत समझ कर सींचा।
वही पल आज
एक मतलबी दौर सा लगने लगा है।
मलतब के लोगों में
अजनबी सा खुद को
लगने लगा हूँ।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

बेटी एक चहल

बेटी एक चहल है,
बेटी एक पहल है।
बेटी ही आज है,
बेटी ही कल है।
बेटी आश है,
समाज का विकास है।
अगर ऐसी सोच
सभी की हो जाये।
हर घर को बेटी महकाए।
बेटी में कई रूप समाये।

बेटी एक पहल है,
हर दुविधा का हल है।
कभी माँ तो कभी बहन है,
कभी पत्नी तो कभी बहु,
बेटी समाज का आधार है।
बेटी करुणा और प्यार है।
बेटी समाज की डोर है,
हर पहलू की छोर है।

बेटी एक चहल है,
सृष्टि की रचना की पहल है।
बेटी नहीं तो जग नहीं।
आने वाला कोई युग नहीं।
बेटी ने किया उपकार मुझ पर।
कभी माँ बनकर जन्म दिया,
कभी बहन के रूप में,
बहन का प्यार दिया।
तो कभी पथिक बनकर,
जीवन के सफर में साथ दिया।
नमन् करूँ हर बेटी को मै।
जिसने स्वयं दुःख पाकर,
हम सभी को सुख दिया।

बेटी है तो जग है
हर राह है हर पग है।
आओ प्रण करें सब मिलकर,
बेटी का सम्मान बढ़ाएँ,
कुरीतियों को जड़ से मिटायें।
बेटी निर्मल है,
बेटी आज है,
बेटी कल है।
©धीरेन्द्र सिंह बिष्ट
28.09.2015

दहेज़ हमारे समाज का कोढ़

ना रीत है ना प्रीत है।
दहेज प्रथा समाज में चला रहे
कुछ लोगों की ये गलत नीत है।
कहावते तो अनेक हैं
पर उनमें से ये एक है।
बेटी का घर मायका नहीं ससुराल है।
फिर दहेज़ क्यों देना होता है?
जब बेटी का घर ससुराल होता है।

बुजदिल है वो पिता,
जो अपनी बेटी को बोझ समझता है।
लोभी है वो पिता,
जो अपने बेटे की आढ़ में दहेज़ लेता है।
क्यों आप दहेज़ का प्रलोभन देकर
किसी बेटे को कमजोर कर रहे हो।
क्यों तुम दहेज़ माँग कर
किसी बेटी को मजबूर कर रहे हो।

दहेज़ देना भी पाप है,
दहेज़ लेना भी पाप है।
दहेज़ दो घरो का जोड़ नहीं,
ये समाज का कोढ़ है।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट।

“गुमसुम मंजिल”

मंजिल क्यों आज
गुमसुम सी लगने लगी है।
हर कोशिश,
आज यूँ नाकाम सी
लगने लगी है।
अब और इम्तिहान ना ले,
मेरी तकदीर के ऐ मालिक।
मैं इतना भी मजबूत नहीं।
जो तेरी परख का इम्तिहान दे सकूँ।

मंजिल क्यों आज गुमसुम
सी लगने लगी है।
हर उम्मीद की किरण
क्यों आज ढलने लगी है।
कोशिश के साथ आज,
मैं आस लगाये खड़ा हूँ।
अपनी मंजिल की चाह में
उम्मीदों का दामन फैलाये खड़ा हूँ।
राह की मुश्किलों ने झिजोड़ा
हर कदम पे ठोकरों ने तोड़ा ,

मंजिल क्यों आज
गुमसुम सी लगने लगी है।
इन्तजार की घड़ी अब क्यों
बढ़ने लगी है।
अब और इन्तजार मुझे
भाता नहीं।
बीता हुआ समय कभी
लौट कर आता नहीं।
दुःखों का वो सफर,
सुख पाने की चाह में
भुला दिया हमने।

वक्त के आगे कमजोर से
यूँ पड़ने लगे हैं हम।
खुद को मनाते,
हर गम भुलाते
मन में हर आस जागाते
बढ़े हैं हम।
दुःख को सबक और
सुख को सीख समझकर
हर रीत निभाते चले हैं हम।
मंजिल क्यों आज गुमसुम सी लगने लगी है।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

शनिवार का दिन

कहानी का सारांश :
इस कहानी में केवल एक शनिवार के दिन का वर्णन किया है। कहानी में मुख्य भूमिका एक नन्हे बालक की है। बालक अपने बालपन के कारण अपनी पढ़ाई के प्रति थोड़ा लापरवाह है। किन्तु बालक के मन में पिता के प्रति उनकी आज्ञा का पालन और उनके अनुशासन का डर का वर्णन कहानी में किया है। दूसरी भूमिका पथ-प्रदर्शन के तौर पर बालक के पिता भानु प्रताप की है। भानु प्रताप अपने बेटे को बहुत प्रेम करते हैं, किन्तु वह अपने पुत्र को ज्यादा लाड़ नहीं लड़ाते, वह इस बात से भली भाँति परिचित है ज्यादा लाड़ लड़ाने से उनका बेटा बिगड़ सकता है। इसीलिये बेटे के प्रति मन में प्रेम की भावना और मुँख पर एक कड़ा अनुशासन की भूमिका निभाते हैं। जिससे उनका बेटा आगे चल कर एक अच्छे पथ पर अपनी पहचान कायम करता है।

        शनिवार का दिन है। हल्की सी शीत लहर बह रही है। आसमान साफ है पक्षी रोज की तरह अपने समूह में अपने भोजन की तलाश में निकल रहे हैं। मैं एक टक गर्दन ऊपर किये उनको देख रहा हूँ। और मुस्कुरा कर उनको देखता हूँ, यह बात सोच कर मन ही मन निराश भी हो रहा हूँ, ”रोज की तरह आज भी स्कूल जाना है”
माँ ने स्कूल के लिये तैयार किया। किन्तु मेरा मन स्कूल जाने का नहीं था। तभी मैने बुखार का बहाना बना लिया, पर मेरा झूठ पापा के सामने नहीं चलने वाला।
पापा ने गुस्से से कहा- ”स्कूल जाता है या मैं ले जाऊ।”
मेरे लिये इतना ही सुनना काफी था। माँ ने स्कूल बैग और मेरा टिफिन दिया और मैं स्कूल के लिये निकला। आगे जा कर रस्ते में मेरे स्कूल के और भी दोस्त मिले, उनमें से दीपक मेरा बहुत प्रिय मित्र था।
दीपक-”मास्टर जी ने होम वर्क दिया था, कविता याद की या फिर भूल गया।”
तभी मैं अचानक दीपक की बात सुनकर और ज्यादा डर गया और मन ही मन सोचने लगा। ”आज फिर से स्कूल में मास्टर जी द्वारा मुर्गा बनना पड़ेगा।
इतने में दीपक बोला, ”क्या सोच रहा है? कुछ पूछा था, उसका जवाब दिये बिना कहा खो गया।
रोज की तरह आज भी मेरा जवाब नहीं था।
दीपक-”जल्दी चल स्कूल के लिये देर हो रही है।”
मेरा मन स्कूल जाने का बिल्कुल नहीं था, और मैं दीपक से बोला, ”क्यों ना आज पास के तालाब में मछलियाँ पकड़ने चलें।”
दीपक- ”अरे नहीं नहीं मास्टर जी के हाथ मुझे नहीं पिटना है, तू जा मुझे स्कूल जाना है।”
दीपक के बात सुनकर मैं बोला, ”अरे कल रविवार है, मास्टर जी सोमवार तक भूल जाएँगे।”
पहले तो दीपक मेरी बात को नकारता रहा, फिर किसी तरह मैने उसे मना लिया।आखिर वो मेरा सबसे प्रिय दोस्त जो था। तालाब के पास पुरे दिन खेलते रहे। जैसे-जैसे दिन ढलने लगा फिर घर की याद आई।
”चल अब घर चल शाम होने को है” ऐसा मैं दीपक से बोला।
आज में मन ही मन खुश था, मुर्गा बनने से बच गया। किन्तु जब घर पहुँचा तो मास्टर जी और आस पड़ोस के दो-चार लोगों को घर में पाया देख, मेरे पैरों तले जमींन खिसक गई।

(उस दिन को मैं आज भी आज तक नहीं भुला, जब भी किसी स्कूल के बच्चे को देखता हूँ, तो एक पल के लिये अपने बीते दिनों में खो जाता हूँ।)
मास्टर जी- ” बेटा कहाँ थे, आप और दीपक पुरे दिन?” मैं चुप्पी साध के अपने जूते के तनों को देख रहा था।
तभी पापा गुस्से में, ”मोहित बताओगे या फिर छड़ी निकालूँ”।
पापा के डर के कारण मैने सारी बात सच-सच बता दी।
मास्टर जी ने दो-चार ज्ञान की बात बताई और समझाया। फिर सभी लोग अपने अपने घर को चले गये।
इधर पापा को मेरी हरकतों से बहुत क्रोध आया था। पापा ने मेरी बहुत पिटाई की। फिर थोड़ी देर बात प्यार करने लगे। और बहुत सारी बातें समझाने लगे।
उस दिन से मैने स्कूल का कोई भी दिन गोल नहीं किया। समझ की कमी होने से तब मुझे स्कूल जाना और घर पर पढ़ना गन्दा लगता था। तब मुझे ना ही समय का अहसास था और ना ही मेरी पढ़ाई का। किन्तु आज सोचता हूँ, कि मम्मी-पापा ने जो भी किया वो मेरे आज और आने वाले भविष्य के लिये किया।
”समय कभी भी इंसान को वर्तमान का अहसास नहीं कराता,
किन्तु भविष्य, भूतकाल की बातों पर हमें जरूर पश्चाताप कराता है।”
पापा का अनुशासन मेरे लिये एक पथ-प्रदर्शक साबित हुआ।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

मौली

(इस कहानी में मौली एक गाय का नाम है। कहानी में मुख्य भूमिका मौली की है उसके बाद एक नन्हे चार वर्षीय बालक की है। बालक बहुत नटखट और शरारती है
पर समय के अनुसार उसे मौली से बहुत लगाव हो जाता है। वैसे मौली एक जानवर है पर वह इंसानों से कई गुना समझदार है।
मौली स्वेत रंग की और दिखने में बहुत सुन्दर प्यारी है।
उसके सिंग पीछे को घुमाऊ आकृति के हैं। इसलिये सब उसे प्यार से मौली कहकर पुकारते है।)
 
      एक दिन मै खेलते खेलते अचानक गौशाला में चला गया। मौली अपना चारा खा रही थी और पूछ से मख्खी को अपने शरीर में बैठने से भगा रही थी। मै उसकी पूछ को देखने लगा और इतने में मैने उसकी पूछ पकड़ ली और झुलने लगा। तभी अचानक मौली का पैर मेरे पैर के ऊपर आ गया, मै जोर से चिल्लाया और रोने लगा। इतने में मौली ने अपने पैर को उठाया और मेरे पैर को अपनी जीभ से चाटने लगी। इतने में माँ आ गई और माँ ने पैर पर मरहम लगाया और गौशाला में जाने से मना किया। कुछ दिन बाद पैर की चोट सही हो गई।
     एक दिन मै फिर से गौशाला की तरफ गया, किन्तु इस बार मै थोड़ा डरा हुआ था फिर भी मै कोशिश करते हुये मौली के पीछे जाने के बजाय आगे की तरफ बढ़ा।
और मौली के सामने खड़ा हो गया।
मैने डरते हुये अपनी अँगुली मौली के नाक पर रखी। मौली मेरी हथेली को अपनी जीभ से चाटने लगी। नटखट तो में था ही, इतने में मुझे एक शरारत सूझी और मै मौली के नाक पर बैठा और उसके सीगों को हाथ से पकड़कर बोला “मौली झूला झूला”। इतने में मौली ने अपना सिर ऊपर किया और गर्दन हिलाई मुझे नीचे गिरा दिया।
तभी आहट सुनकर माँ आ गई पर इस बार मुझे कोई चोट नहीं आयी। माँ कान पकड़कर ले गई।
अगले दिन जैसे ही सवेरा हुआ में पुनः गौशाला गया और वही हरकत फिर दोहराई और बोला “मौली झूला झूला”। किन्तु आज मौली ने मुझे नीचे गिराने के बजाय झूला झुलाया। मै बहुत खुश हुआ। मेरी ये शरारतें रोज होने लगी। मेरा रोज का नियम बन गया, मौली की नाक में बैठकर झूला झूलने का। मौली जानवर होने के बाद भी एक बच्चे (मुझे) को माँ की तरह बहुत प्यार करती थी। मेरा और मौली का साथ इतना ही था।
   एक दिन अचानक पापा ने मौली को दूर के सम्बंधियों को शौप दिया। यह सुनकर मुझे बहुत दुःख हुआ। मै मौली के पास रोज की तरह गया और मौली ने मुझे झुलाने के लिए अपना सर नीचे की ओर झुकाया पर उस दिन मै झूलने की बजाय, उसे बिस्किट दिये और उसके कान मै बोला “मौली तू उनके साथ मत जाना”। पर तब में नादान था और वो बेजुबां मौली बेबस थी। जैसी ही वो लोग मौली को ले जा रहे थे तब मौली बार बार अपने कदम पीछे को ओर खींच रही थी। किन्तु वो लोग फिर भी मौली को ले गये। मै देखता रहा और पुरे दिन रोता रहा पर किसी ने मेरी नहीं सुनी।
   उस दिन के बाद से मैने मौली को कभी नहीं देखा। आज भी मै उन पलों के बारे मै जब भी सोचता हूँ,
पहले अपनी नटखटपन से मुस्कुराता, फिर आँखों की लहरों को ना रोक पाता।
“मेरी प्यारी मौली”
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

सपनों में नहीं रहना मुझे

सपनों में नहीं रहना मुझे,
हकीकतों में जीना है मुझे।
मेरी कोशिश ही,
मेरी जीत तय करेगी।
मेरी सोच मेरी कामयाबी की मिसाल बनेगी।
मेरी कामयाबी,
सभी को प्रेरित करेगी।

सपनों में नहीं रहना मुझे।
मुश्किलों से लड़ना है मुझे।
काँटों से फूलों को चुनना है मुझे।
जिन्दगी की दौड़ में,
हर मुसीबत से भिड़ना है मुझे।
परिणाम की परवाह छोड़ कर,
मंजिल की ओर बढ़ना है मुझे।

सपनो में नहीं रहना मुझे।
मैं अक्सर बन्द आँखों के
सपनों से डर कर बिखर जाता हूँ ,
सुहानी नींद से जागकर
अधूरी मंजिल को पाता हूँ।

बन्द आँखो के सपनों का क्या है,
मन को निराश बना जाते हैं।
जिन्दगी की दौड़ में,
मेरी उम्मीद को भटकाते हैं।
बिखर कर बनना
अच्छा लगता है।
किन्तु बनकर बिखरना,
बुरा लगता है।

इन सपनों में पड़कर
अक्सर बहुत कुछ खोया है मैने।
आँखों को आसूँ से
हर दिन भिगोया है मैने।

ख्यालों में खोकर,
सपने देखना छोड़ दिया मैने।
अपनी आने वाली मंजिल को,
नया मोड़ दिया है मैने।

रुक रुक कर,
सफर तय करना है मुझे।
हकीकतों में रहकर
मंजिल को पाना है मुझे।
सपनों में नहीं रहना है मुझे।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट

फाउन्टेन पैन

कहानी का सारांश
      (इस कहानी में मुख्य भूमिका एक पाँचवी कक्षा में पढ़ने वाले बालक की है। जो फाउन्टेन पैन पाने के लिए बहुत उत्सुक रहता है, दूसरी भूमिक उसके उसके पिता की है, पुत्र के मन की लालशा पूरी करने के लिये पिता ने पुत्र के मन में एक उमंग जगाई।)

       एक दिन मै अपनी कक्षा में सहपाठियों को फाउन्टेन पैन से लिखता देख, मेरे मन में भी फाउन्टेन पैन पाने की लालशा जगी। तभी मै अपने सहपाठियों के पास गया और बोला ” आपकी फाउन्टेन पैन बहुत सुन्दर है, क्या आप लोग मुझे इस फाउन्टेन पैन से लिखने दोगे? उन्होंने इंकार कर दिया। सहपाठियों की बात सुनकर मै मन ही मन बहुत दुःखी हुआ और रास्ते भर फाउन्टेन पैन के बारे में सोचता रहा। आँखो में बार बार फाउन्टेन पैन ही चमक रही थी। घर आया और माँ से फाउन्टेन पैन के बारे में जिक्र किया। फाउन्टेन पैन उस जमाने के अनुसार बहुत महँगा था किन्तु माँ ने मेरा मन रखने के लिए हाँ बोल दिया। शाम हुई पिता जी खेतों से घर आये। संध्या पूजा के बाद माँ ने पिता जी को मेरी नयी माँग, फाउन्टेन पैन के बारे में बताया। पिता ने माँ की बात सुनी और विनम्र भाव से बोले “फाउन्टेन पेन बहुत क़ीमती है”।
माँ ने जवाब दिया “पर बेटे से बढ़के थोड़ी है।” माँ की बात सुनकर पिता जी बोले आपकी बात सही है, पर अभी उसकी कोई भी माँग पूरा करने का उचित समय नहीं है।
“यदि मै उसे अभी फाउन्टेन पैन ला के दूँ तो उसे उसकी अहमियत पता नहीं लगेगी। उसकी माँग बढ़ती जायेगी और वह पढ़ाई में मन नहीं लगा पायेगा। जब तक वह कोई अच्छी उपलब्धि हासिल नहीं कर लेता। अभी उसकी फाउन्टेन पैन पाने की कोई माँग पूरी नहीं होगी।
     पिता जी का कहना भी समय के अनुसार उचित था पर तब मै इस बात को समझने में असमर्थ था।
   अगले दिन प्रातःकाल पिता जी ने फाउन्टेन पैन की माँग पूरी करने से साफ मना कर दिया। यह सुनकर मुझे बहुत बुरा लगा। मै उदास मन से स्कूल गया। घर लौटते समय मन ही मन पैन पाने की लालशा के बारे में सोचता रहा। जैसे ही मै घर पहुँचा। माँ ने हाथ पैर धुलवाये और खाना खाने को बैठाया, किन्तु मैने खाना खाने से इंकार कर दिया।
शाम को माँ ने पिता जी को बताया कि आज सुबह से मैने कुछ नहीं खाया।
   माता पिता जी का लाड़ला तो था ही पर पिता जी ज्यादा लाड़ नहीं दिखाते थे। वो मन ही मन घबराते थे कही मै बिगड़ ना जाऊँ।
    अगले दिन माँ ने मुझे स्कूल के लिए तैयार किया, तभी पिता जी आये और मेरा हालचाल पूछने लगे किन्तु मै खामोश रहा। वो समझ गये कि मैने मन में फाउन्टेन पैन पाने की हठ बना ली है।
  यह सब देख कर पिता जी शान्त रहे और अचानक बोल पड़े “फाउन्टेन पैन की माँग तो आपकी पूरी होगी, पर मेरी भी एक शर्त है। पिता जी की बात सुनकर मै मन ही मन ख़ुशी से झूम उठा।
    मेरे मन में फाउन्टेन पैन पाने की लालशा थी तो मै हर शर्त पूरा करने के लिये उत्सुक था। पिता जी बोले ” यदि इस बार तुम कक्षा अच्छे अंको से परीक्षा उत्तीर्ण करोगे तो मै आपकी फाउन्टेन पैन की माँग पूरी करूँगा। पिता जी की बात सुनकर पहले तो चुप रहा फिर अचानक बोला पड़ा, “मुझे मंजूर है।”
    फिर क्या था, पिता जी ने मेरे अन्दर फाउन्टेन पैन पाने के लिए एक नयी उमंग जगा दी। फाउन्टेन पैन की लालशा के कारण मैने खेलना भी कम कर दिया। स्कूल से आता बस पढ़ाई में करने बैठता। मेरे अन्दर इस बदलाव को देख कर पिता जी मन ही मन मुस्कुराते थे।
    धीरे धीरे परीक्षा समीप आ गई। मै परीक्षा के लिए परिपूर्ण था। फिर भी एक डर मन को अन्दर ही अन्दर शता रहा था। परीक्षा पूर्ण हुई। सभी सहपाठियों के अभिभावको को विद्यालय में बुलाया गया। मै और पिता जी स्कूल पहुँचे। सबके सम्मुख प्रधानाध्यापक ने मुझे सराहा मै कक्षा में अच्छे अंको से उत्तीर्ण हुआ था। पिता जी बहुत खुश हुये। घर लौटते समय सर्वप्रथम पिता जी ने मुझे फाउन्टेन पैन दिलाया। फाउन्टेन पैन पाकर मै ख़ुशी से फुला ना समा सका। पहली बार इतना खुश था कि मानो मैने अपने जीवन की अमूल्य वस्तु प्राप्त कर ली। पर वह फाउन्टेन पैन पाना मेरे लिये बहुत बड़ी उपलब्धि थी।
    “उपलब्धियां चाहे कितनी छोटी या फिर बड़ी ही क्यों ना हो,
इंसान का हौसला जरूर बुलन्द करती हैं।”
फाउन्टेन पैन पाने की यही उत्सुकता आगे जाकर मेरी सफलता बनी।
© धीरेन्द्र सिंह बिष्ट